भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 231

पञ्चदशोऽध्यायः। २१७ इति पूर्वोत्तरवचो मन्यसे सङ्गतं कथम्। अवेद्यं चेन्न जानामि नास्तीति च निरूपय ॥ ६६ ॥ अस्ति जानासि यदि तदवेद्यमिति मा वद। अथैतत्तु त्वया विप्र शास्त्रदृष्ट्या विभावितम् ॥ ६७ ॥ न तत्स्वयं विजानासि तस्मात्तच्चापरोक्षकम्। दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः सर्वं प्रतिबिम्बं यथास्थितम् ॥ ६८ ॥ आदर्शं न विजानासि प्रत्यक्षेणेति तत्कथम्। एवं वदन् सभामध्ये जनकस्यास्य वै पुरः ॥ ६९ ॥ परिभूतं स्वमात्मानं मन्यसे नो कथं वद। एवमुक्तस्तया तत्र नैव प्रोवाच किञ्चन ॥ ७० ॥ विमना इव सञ्जातो लज्जितोऽभवदञ्जसा। अवाङ्मुखः क्षणं स्थित्वा विचार्यान्तस्तयेरितम् ॥ ७१ ॥ तत्प्रश्नोत्तरमप्राप्य तां प्राह द्विजसत्तमः। लेनेपर ही साधक अविनाशी अमरपद प्राप्त कर लेता है—सो, इन पहले और पिछले दोनों वाक्योंकी परस्पर संगति कैसे लगेगी ? ॥६५-६६ पू०॥ यदि वह अवेद्य है तो कहो कि मैं उसे नहीं जानता अथवा वह पद है ही नहीं। और यदि वह है तथा तुम उसे जानते हो तो ऐसा मत कहो कि वह अवेद्य है ॥ ६६ उ०-६७ पू० ॥ इसके सिवा ब्राह्मणदेवता ! तुमने तो यह बात शास्त्रदृष्टिसे कल्पना कर ली है। स्वयं अनुभव करके तो जानी नहीं। इसलिये उसका तुम्हें अपरोक्ष ज्ञान तो है नहीं ॥ ६७ उ०-६८ पू० ॥ जब तुम सारे प्रतिबिम्बको ज्योंका त्यों प्रत्यक्ष देखते हो तो [ उसके आश्रयभूत ] दर्पणको प्रत्यक्ष क्यों नहीं जानते ? ॥ ६८ उ०-६९ पू० ॥ इस सभामें राजा जनकके सामने ऐसी बात कहने हुए भी, भला बताओ तो, तुम अपनेको परास्त हुआ क्यों नहीं मानते ?" ॥ ६९ उ०-७० पू० ॥ तपस्विनीके ऐसा कहनेपर अष्टावक्र कुछ भी न बोल सका। वह उदास- सा हो गया और स्वभावसे ही लज्जित भी हुआ ॥ ७० उ०-७१ पू० ॥ कुछ देर नीचा मुख किये बैठा रहा और उस तपस्विनीके कथन-