त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यदुपाश्रित्य वै सर्वं जगदेतद्विराजते । आदर्शानगरप्रख्यं तदेतत्परमं पदम् ॥ ६० ॥ प्राप्नोति तद्विदित्वैव निश्चलामृतसंस्थितिम् । आदर्शे विदिते यद्वत् सन्देहः क्वचिद्भवेत् ॥ ६१ ॥ प्रतिबिम्बेष्वनन्तेषु न स्यादविदितं तथा । नाशास्यं वा भवेत्किञ्चिदेवं प्रविदिते परे ॥ ६२ ॥ तच्चाप्यवेद्यमन्यस्य वेदकादेरभावतः एवं तापसि तत्तत्त्वं शास्त्रदृष्ट्या विभावितम् ॥ ६३ ॥ इत्यष्टावक्रवचनं श्रुत्वा सा पुनरब्रवीत् । मुनिदारक सूक्तं ते यथावत्सर्वसम्मतम् ॥ ६४ ॥ यदुक्तं वेदकाभावादवेद्यं तदिति त्वया । प्राप्नोति तद्विदित्वैव चामृतं पदमव्ययम् ॥ ६५ ॥ आदि है, न मध्य है और न अन्त है। वह देश और कालसे सीमित नहीं है तथा शुद्ध, अखण्ड और चिन्मय है ॥ ५६ ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान जिसका आश्रय लेकर यह सारा जगत् विद्यमान है वही तुम्हारा पूछा हुआ परम पद है ॥ ६० ॥ जिस प्रकार दर्पणको जान लेनेपर उसमें प्रतिबिम्बित किसी भी वस्तुकी स्थितिके विषयमें कोई सन्देह नहीं रहता उसी प्रकार उस पदको जान लेनेपर ही साधक अविचल अमरपद प्राप्त कर लेता है ॥६१॥ तथा जैसे [दर्पणका ज्ञान होनेपर] उसके अनन्त प्रतिबिम्बोंमें से कोई भी अज्ञात नहीं रहता उसी प्रकार उस परमपदको जान लेनेपर किसी वस्तुकी आशा (चाह) नहीं रहती ॥ ६२ ॥ अवश्य ही वह किसी अन्यके द्वारा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि उसका कोई अन्य ज्ञाता है ही नहीं। तपस्विनीजी ! शास्त्र-दृष्टिसे उस तत्त्वके विषय में ऐसा निर्णय किया गया है” ॥ ६३ ॥ अष्टावक्रका ऐसा कथन सुनकर वह फिर बोली, “मुनिपुत्र ! तुम्हारा कथन बड़ा सुन्दर है। तथा वह यथार्थ और सर्वसम्मत भी है ॥ ६४ ॥ किन्तु तुमने जो कहा कि उसका कोई अन्य ज्ञाता न होनेके कारण वह पद अवेद्य है और [साथ ही यह भी कहा कि] उसे जान