भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

पञ्चदशोऽध्यायः । २१५ कहोलसुत वत्स त्वमत्यन्तं बुद्धिमानसि । त्वया विमोचिता विप्रा वादे निर्जित्य वारुणिम् ॥ ५३ ॥ अहं पृच्छामि किञ्चित्त्वां वद हित्वा सुकैतवम् । यत्पदं विदितं सर्वामृतत्वप्रतिपादकम् ॥ ५४ ॥ यत्पदे विदिते सर्वसन्देहः प्रलयं व्रजेत् । अविज्ञातं न किञ्चित्स्यादाशास्यं वा न किञ्चन ॥ ५५ ॥ अवेद्यं विदितं तच्चेद्वद मामुप सत्वरम् । तापस्यैवं समापृष्टः कहोलतनयोऽब्रवीत् ॥ ५६ ॥ विदितं तत्पदं भूयो वच्मि तापसि संशृणु । न मे ह्यविदितं लोके ह्यस्ति किञ्चित्कियच्चिदम् ॥ ५७ ॥ मया शास्त्राणि सर्वाणि भूयः संलुलिठतानि वै । यत्त्वं पृच्छसि तद्वक्ष्ये शृणु तापसि तत्त्वतः ॥ ५८ ॥ तद्धि सर्वजगद्धेतुरादिमध्यान्तवर्जितम् । देशकालानवच्छिन्नं शुद्धाखण्डचिदात्मकम् ॥ ५९ ॥ “कहोलपुत्र ! बेटा ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो । तुमने वरुणपुत्रको विवादमें जीतकर सभी ब्राह्मणोंको छुड़ा दिया ॥ ५३ ॥ मैं तुमसे कुछ पूछती हूँ । तुम कपट त्यागकर बताओ । जो पद जान लिये जानेपर सब प्रकार की अमरता प्रदान करनेवाला है, जिस पदको जान लेनेपर सारे सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, कुछ भी जानना शेष नहीं रहता और न कोई चाहने-योग्य वस्तु ही रहती है, ऐसा जो अवेद्य पद है वह यदि तुम्हें विदित है तो शीघ्र ही मेरे सामने कहो ।” तपस्विनीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर कहोलपुत्रने कहा-॥५४-५६॥ “उस पदको मैं अच्छी तरह जानता हूँ और तपस्विनीजी ! सुनो, तुम्हें बताता हूँ । संसारमें ऐसी कोई बात नहीं है जो मैं नहीं जानता । तुम्हारे इस प्रश्नमें तो है ही क्या ? ॥ ५७ ॥ मैंने सारे ही शास्त्रोंका अनेकों बार आलोडन किया है । तुम जो कुछ पूछती हो अभी ठीक-ठीक बताये देता हूँ । तपस्विनीजी ! सुनिये ॥ ५८ ॥ तुम्हारा पूछा पद ही सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण है । उसका न