त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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वारुणं यज्ञमासाद्य मुमुदुः पूजिता भृशम् ॥ ४६ ॥ मज्जितं पितरं श्रुत्वा कहोलं तत्सुतस्ततः । अष्टावक्रः समागत्य ज्ञानवैतण्ड्यजल्पकः ॥ ४७ ॥ विजित्य वारुणिं सिन्धावादिदेश निमज्जने । अथ प्रकाशमापन्नो वारुणिर्द्विजमुख्यान् ॥ ४८ ॥ समानयत्स्वलोकस्थानष्टावक्रेण निर्जितः । अथागतेषु विप्रेषु कहोलतनयो भृशम् ॥ ४९ ॥ विप्रान् विमोचितान् सर्वानत्यवर्त्त दर्पतः । अष्टावक्रेण विमता विप्राः खेदमुपागताः ॥ ५० ॥ तत्काल आगतां कांचित्तापसीं शरणं ययुः । तान्समाश्वास्य विप्रान् सा काषायाम्बरवासिनी ॥ ५१ ॥ जटिला नित्यतरुणी मनोहरवपुर्धरा । सभामुपैत्य प्रोवाच नृपेणाभिसुपूजिता ॥ ५२ ॥
वरुणकी यज्ञशालामें पहुँचनेपर खूब सत्कार पाकर वे बड़े प्रसन्न होते थे ॥ ४६ ॥ कहोलका पुत्र अष्टावक्र वितण्डा और जल्पमें बड़ा प्रवीण था। जब उसने अपने पिताको समुद्र में डुबाया सुना तो वहाँ आकर वरुणपुत्रको परास्त किया और उसे समुद्रमें डुबानेका आदेश दिया ॥ ४७-४८ पू० ॥ अष्टावक्रसे परास्त होनेपर वरुणपुत्रने अपनेको प्रकट कर दिया और अपने लोकसे सभी द्विजश्रेष्ठोंको ले आया ॥ ४८ उ०-४९ पू० ॥ सब ब्राह्मणोंके आनेपर कहोलपुत्रको बड़ा अभिमान हुआ और वह वरुणके यहाँसे छुड़ाये हुए ब्राह्मणोंसे अपना बड़प्पन प्रकट करने लगा। इस प्रकार अष्टावक्रसे अपमानित होनेपर ब्राह्मणोंको बड़ा खेद हुआ ॥ ४९ उ०-५० ॥ उसी समय वहाँ एक तपस्विनी आयी। वह काषाय वस्त्र धारण, किये थी, उसके सिरपर जटाएँ थीं, योगाभ्यासके कारण नित्य तरुणा- वस्थामें रहती थी और अत्यन्त मनोहर शरीरवाली थी। राजाने उसका खूब सत्कार किया। वे सब उसकी शरणमें गये। उनको सान्त्वना दे उसने सभामें आकर कहा-॥ ५१-५२ ॥