त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एतत्तेऽभिहितं सर्वं मुनिपुत्र नमोऽस्तु ते ॥ ९८ ॥ व्रजाम्यहं त्वयः चैतन्न विज्ञातं सकृच्छ्रुतेः । बोधयिष्यति त्यामेष राजा बुद्धिमतां वरः ॥ ९९ ॥ पृच्छ भूयः संशयं ते सर्वं छेत्स्यति वै नृपः । इत्युक्त्वा पूजिता राज्ञा प्रणता च सभासदैः ॥ १०० ॥ वातनुन्नाभ्रलेखेव क्षणादन्तर्द्धिमाययौ । एतत्तेऽभिहितं राम वेदनप्रक्रियात्मनः ॥ १०१ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावकीये पञ्चदशोऽध्यायः । प्राप्त कर लोगे। यह मैंने तुमसे सारा रहस्य कह दिया। मुनिपुत्र ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ९८ ॥ अब मैं जाती हूँ। एक बार सुन लेनेसे ही तुम इसे जान नहीं सकोगे। ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज जनक तुम्हें इसका बोध करायेंगे। तुम इनसे पुनः प्रश्न करना। महाराज तुम्हारे सब संशयोंका छेदन कर देंगे” ॥ ९९-१०० पू० ॥ ऐसा कहकर वह उठी। राजाने उसका पूजन किया तथा अन्य सभासदोंने प्रणाम। फिर वह वायुसे विचलित हुई मेघमालाके समान एक क्षणमें ही अन्तर्धान हो गयी। परशुराम ! मैंने तुम्हें यह आत्माका ज्ञान होनेकी प्रक्रिया सुना दी ॥ १०० उ०-१०१ ॥ पञ्चदश अध्याय समाप्त।