भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 235

पञ्चदशोऽध्यायः । २२१ अप्रकाशो यथा भाति सा न भायात्कथं वद । भाति चेत्सा कथं भाति विमृशैतत्सुसूक्ष्मतः ॥ ९२ ॥ अत्र सर्वे न पश्यन्ति कुशला अपि पण्डिताः । अनन्तर्दृष्टयस्तेन मोहिताः संसरन्ति च ॥ ९३ ॥ यावद् दृष्टिः प्रवृत्तिं तु न परित्यज्य तिष्ठति । तावदन्तर्दृष्टितापि न स्यादेव कथञ्चन ॥ ९४ ॥ यावन्नान्तर्दृष्टिमेति तावत्तां न प्रपश्यति । अन्तर्दृष्टिर्निरीहा स्यात् सेहायाः सा कथं भवेत् ॥ ९५ ॥ परिहृत्य तु तां सम्यक् स्वभावमुपसंश्रय । क्षणं स्वभावमाश्रित्य निर्विमर्शस्ततः परम् ॥ ९६ ॥ विमृश्य स्मरणद्वारा ततो वेत्सि समस्तकम् । असंवेद्यं सुवेद्यं च तदेवं तत्त्वमुच्यते ॥ ९७ ॥ विदित्वैवमवेद्यं च प्राप्नुयादमृतां स्थितिम् । अप्रकाशरूपसे भी तो वह चितिशक्ति ही प्रकाशित होती है ॥ ९१ ॥ भला, जिससे अप्रकाशका भी भान होता है वह स्वयं क्यों भासित नहीं होगी ? और यदि भासती है तो किस प्रकार भासती है—इसपर सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो ॥ ९२ ॥ अन्तर्दृष्टि हुए बिना इस रहस्यको बड़े निपुण विद्वान् भी नहीं समझ पाते । इसीसे वे मोहग्रस्त रहकर संसार-चक्रमें पड़े रहते हैं ॥९३॥ जबतक दृष्टि बाह्य प्रवृत्तिको त्यागकर स्थिर नहीं होती तबतक किसी प्रकार अन्तर्दृष्टिता भी प्राप्त नहीं हो सकती ॥ ९४ ॥ और जबतक अन्तर्दृष्टि नहीं होती तबतक उसका साक्षात्कार नहीं होता । अन्तर्दृष्टि तो निःसंकल्पता है अतः संकल्पोंके रहते हुए वह कैसे हो सकती है ॥ ९५ ॥ अतः तुम संकल्पोंको अच्छी तरह त्यागकर अपने स्वरूपका आश्रय लो और एक क्षण स्वरूपमें स्थित रहकर फिर निश्चिन्त हो जाओ ॥९६॥ फिर उस अवस्थाके स्मरण द्वारा तुम यह सब कुछ जान जाओगे कि वह तत्त्व अज्ञेय है और सुज्ञेय भी है—ऐसा क्यों कहा जाता है ॥९७॥ इस प्रकार उस अविज्ञेय तत्त्वको जानकर तुम अमृत-स्थिति