त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे संवृतो बहुभिर्विप्रैः समेत्य नृपपुङ्गवम् ॥ ६ ॥ पप्रच्छ यत्तु तापस्या सङ्क्षिप्तोक्तं महार्थकम् । तदुच्यमानन्तु मया सम्यक् शृणु समाहितः ॥ ७ ॥ राजन् विदेहाधिपते तापस्योक्तं तु यत्तया । तदहं नाऽविदं सम्यक् सङ्क्षेपोक्तत्वहेतुतः ॥ ८ ॥ कथं विद्यामवेद्यं तत् समाचक्ष्व दयानिधे । एवं जनक आपृष्टः प्राह तं विस्मयन्निव ॥ ९ ॥ मुनिपुत्र शृणु वचो मया यत् प्रोच्यतेऽधुना । नाऽवेद्यं सर्वथा तद्धि वेद्यञ्चापि न सर्वथा ॥ १० ॥ अवेद्यं चेत् सर्वथैव तद् गुरुः किं वदेद्वद । गुरुरावेदयेत्तत्त्वमत आदौ गुरुं श्रयेत् ॥ ११ ॥ एतद्वेदनमत्यन्तं सुलभं दुःशकं च हि । यः परावृत्तदृष्टिः स्यात्तस्य तत् सुलभं भवेत् ॥ १२ ॥ साथ ले नृपश्रेष्ठ जनकके पास आये और तपस्विनीने जो परम पुरुषार्थ सम्बन्धी प्रसंग संक्षेपसे कहा था उसीके विषयमें प्रश्न किया। वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सावधानीसे श्रवण करो ॥ ६-७ ॥ [परशुरामने पूछा—] “विदेहराज महाराज जनक ! उस तपस्वि- नीने जो कुछ कहा था वह बहुत संक्षिप्त होनेके कारण मैं उसे अच्छी तरह समझ नहीं सका। दयानिधे ! यह बात समझाकर कहिये कि मैं उस अज्ञेय तत्त्वको कैसे जान सकता हूँ ?” इस प्रकार पूछे जानेपर जनकने कुछ विस्मित होकर कहा—॥ ८-९ ॥ “मुनिपुत्र ! अब मैं जो बात कहता हूँ सुनो। वह पद न तो सर्वथा अज्ञेय है और न सभी प्रकार ज्ञेय ही है ॥ १० ॥ यदि वह सर्वथा अज्ञेय ही होता तो बताओ गुरुदेव क्या बतलाते। उस तत्त्व का ज्ञान तो गुरुदेव ही कराते हैं, इसलिये सबसे पहले उनकी शरणमें जाना चाहिये ॥ ११ ॥ उस पदको जानना अत्यन्त सरल भी है और कठिन भी। जिसकी दृष्टि लौट गयी है [अर्थात् बाह्य विषयोंसे विमुख होकर अन्तर्मुख हो