त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयः पराग्दृष्टिरेवास्ते तस्य तच्चातिदुर्लभम् । अनिरूप्यं केवलं तदवेद्यमपि सर्वथा ॥ १३ ॥ कथञ्चिदन्यरूपेण निरूप्यं वेद्यमप्युत । यद्यद् दृश्यं पश्यसीह तेन तद्वेद्यमुच्यते ॥ १४ ॥ यत्तेऽवभासते किञ्चित् तद्विभावय सद्धिया । भानशक्तिर्भास्यहीना सर्वभानसमाश्रया ॥ १५ ॥ सैव तत्तत्त्वमित्येव विजानीहि मुनेः सुत । वेद्यमेव न वित्तिः स्यात् स्वतो यन्न प्रकाशते ॥ १६ ॥ वित्तिरन्या यया वेद्यं वेद्यते न स्वतः क्वचित् । वेद्यं विभिन्नरूपं वै वित्त्यैव वेद्यते खलु ॥ १७ ॥ तत्तद्रूपविभेदेन वित्तिर्नो भिद्यते क्वचित् । गयी है] उसके लिये वह सरल है। और जो बहिर्मुख दृष्टिवाला ही है उसके लिये उसका ज्ञान अत्यन्त कठिन है ॥ १२-१३ पू० ॥ वास्तवमें तो वह पद एकदम अनिर्वचनीय और सर्वथा अज्ञेय भी है। तथापि किसी प्रकार अन्य रूपसे उसका निरूपण भी किया जाता है और उसे जान भी सकते हैं ॥ १३ उ०-१४ पू० ॥ तुम यहाँ जो-जो दृश्य देखते हो उस घट-पटादि दृश्यमें ज्ञान सामान्यरूपसे वह तत्त्व ही ज्ञेय कहा जाता है।१ तुम्हें जो कुछ भासता है उसपर शुद्ध बुद्धिसे विचार करो। जो भास्यपदार्थसे रहित भान- शक्ति है वही तो सम्पूर्ण भानकी आश्रय है ॥ १४ उ०-१५ ॥ मुनिपुत्र ! वही वह परतत्त्व है—ऐसा तुम जानो। जो ज्ञेय पदार्थ है वही ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशित नहीं होता ॥ १६॥ ज्ञान, जिससे कि ज्ञेय जाना जाता है ज्ञेयसे भिन्न है। ज्ञेय स्वतः कभी नहीं जाना जाता। वह भिन्न-भिन्न रूपोंवाला होता है और निश्चय ज्ञानके द्वारा ही जाना जाता है ॥ १७ ॥ ज्ञेय पदार्थोंके रूपभेदोंसे ज्ञानमें कभी भेद नहीं होता। १. दृश्यरूपसे जो घट-पट आदिके ज्ञान होते हैं उन घटज्ञान-पटज्ञान आदिमें घट-पटादि तो ज्ञेय हैं और उन सबमें अनुस्यूत जो ज्ञानसामान्य है वह वास्तवमें परतत्त्व ही है। इसीका श्रुतिने 'प्रतिबोधविदितं मतम्' कहकर निरूपण किया है।