त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भेदो हि वेद्यधर्मः स्यान्न वित्तिं संस्पृशेत् क्वचित् ॥ १८ ॥ यत आकारभेदो हि वेद्यपक्षे विभासते । पश्य वेद्यं पृथक्कृत्यं बुद्ध्याकारविवर्जितम् ॥ १९ ॥ बिम्बानुकृतिरादर्शो यद्वत्तद्वदियं चितिः । दृश्याकारधृतेर्नानारूपतां प्रतिपद्यते ॥ २० ॥ एवं वित्तिरियं वेद्या वेद्यव्यावृत्तरूपतः । न तु स्वभावतो वेद्या सा वित्तिर्विश्वसंश्रया ॥ २१ ॥ यत एतद्वेदितुः स्याद्रूपं तस्मान्न वेद्यते । विमृशाऽष्टावक्र रूपं निजमेवंविधं स्फुटम् ॥ २२ ॥ न त्वं शरीरं प्राणो वा मनो वाऽप्यस्थिरत्वतः । शरीरं धातुनिकरं तत्ते रूपं कथं भवेत् ॥ २३ ॥ तच्चाऽन्यविषयाभासे त्वहंधियमतित्रजेत् । भेद तो ज्ञेय-पदार्थोंका ही धर्म है, वह ज्ञानको कभी स्पर्श नहीं करता ॥ १८ ॥ क्योंकि आकारका भेद ज्ञेयपदार्थोंमें ही भासता है। अतः तुम ज्ञेयवर्गको अलग करके शुद्ध बुद्धिके द्वारा आकारशून्य ज्ञानका साक्षा- त्कार कर लो ॥ १९ ॥ जिस प्रकार दर्पण बिम्बके आकारको [ प्रतिबिम्बरूपसे ] स्वीकार कर लेता है, उसी प्रकार यह शुद्ध चेतन दृश्यके आकारोंको स्वीकार करके अनेक रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ २० ॥ इस प्रकार ज्ञेयपदार्थोंके निषेधपूर्वक इस चेतनतत्त्वको जाना जा सकता है। सम्पूर्ण जगत्का आधारभूत वह चेतन स्वभावसे ज्ञेय नहीं है ॥ २१ ॥ क्योंकि यह चेतन ज्ञाताका स्वरूप है इसलिये यह ज्ञानका विषय नहीं होता। अष्टावक्र ! तुम अपने ऐसे स्वरूपका स्पष्टतया विचार करो ॥ २२ ॥ तुम न शरीर हो, न प्राण हो और न मन ही हो, क्योंकि ये सब अस्थिर हैं। शरीर तो वात-पित्त आदि धातुओंका समूह है। वह तुम्हारा स्वरूप कैसे हो सकता है ? ॥ २३ ॥ इसके सिवा जब अन्य विषयोंका भास होता है तब देहमें अहं-