त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः । :२९७ एवं प्राणो मनोऽपि स्यादहंबुद्धिव्यतिक्रमात् ॥ २४ ॥ अहंबुद्धिं न व्यतीत्य तिष्ठत्येषा परा चितिः । तस्माच्चितिः सर्ववेत्री त्वमष्टावक्र तत्त्वतः ॥ २५ ॥ पश्य प्रत्यावृत्तचक्षुः स्वात्मानं केवलं चितिम् । आदेशकाल एव स्वं पश्यन्त्युत्तमबुद्धयः ॥ २६ ॥ बुद्धि नहीं रहती । इसी प्रकार अहंबुद्धिसे शून्य होनेके कारण प्राण और मन भी आत्मा नहीं हैं ॥ २४ ॥ यह परा चिति किसी भी समय अहंबुद्धिको त्यागकर नहीं रहती ।२ इसलिये यह सभीको जाननेवाली है । अष्टावक्र ! तुम दृष्टिको अन्तर्मुख करके तत्त्वतः अपनेको शुद्ध चितिरूप ही देखो । जो उत्तम बुद्धिवाले जिज्ञासु होते हैं वे तो उपदेशके समय ही अपने स्वरूपको लख लेते हैं ॥ २५-२६ ॥ १. आत्मा सर्वदा अहं (मैं) रूपसे स्फुरित होता है। शरीरादिके साथ ऐसी बात नहीं है। जब घटादि अन्य पदार्थ भासते हैं तो शरीरादि अहंरूपसे स्फुरित नहीं होते। यदि उस समय भी वे अहंरूपसे भासते तो उनके ज्ञानकालमें हमें ऐसा ज्ञान भी होता कि मैं गोरा-काला या लंबा हूँ। परन्तु ठीक उस समय ऐसा कोई स्फुरण नहीं होता। इसे और स्पष्ट समझनेके लिये यह देखना चाहिये कि जैसे रूपकी प्रतीतिके समय नेत्रोंका और शब्दकी प्रतीतिके समय कानोंका अनु- सन्धान नहीं होता इसी प्रकार घटादिका भान होते समय देहादिका अनुसन्धान नहीं होता । अथवा इसका ऐसा अर्थ भी हो सकता है कि जब इन देहादिका अन्य अर्थात् दृश्यरूपसे भास होता है तब ये 'मैं' रूपसे नहीं भासते अपि तु 'मेरे' रूपसे भासते हैं । अतः अहंबुद्धिसे रहित होनेके कारण ये आत्मा नहीं हैं । २. यहाँ यह शंका हो सकती है कि सुषुप्ति और समाधिके समय तो चेतनमें अहंबुद्धि नहीं देखी जाती । इसका उत्तर यह है कि अहंबुद्धि सविकल्प और निर्विकल्प रूपसे दो प्रकारकी है । जाग्रत् और स्वप्नमें भेदका भान होनेके कारण वह सविकल्प रहती है तथा सुषुप्ति और समाधिके समय भेदका भान न होनेसे निर्विकल्प । यदि उस समय भी सविकल्प अहंस्फूर्ति होती तो त्रिपुटीका लय नहीं हो सकता था । शास्त्रों में उसे 'पूर्णाहंता' कहा है । यदि उन अवस्थाओंमें अहन्ताका सर्वथा अभाव हो जाता तो 'मैं सुखसे सोया' 'मैं समाधिस्थ रहा' इस प्रकार अहन्ताके उल्लेखपूर्वक स्मृति नहीं हो सकती थी । अतः उन अवस्थाओंमें भी अहन्ता रहती ही है ।