भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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षोडशोऽध्यायः। २३१ यदा यत्र च सा नास्ति न यदा नापि यत्र च । तस्माच्चिदात्मावभासे मनसोऽन्यपरावृत्तिः ॥ ४६ ॥ केवलाऽपेक्षिता नैवाभिमुख्यं नूतनं क्वचित् । आभिमुख्याभावहेतोरेवाऽवेद्यत्वमिष्यते ॥ ४७ ॥ अतएव शुद्धमनोवेद्यं तत्तत्त्वमुच्यते । अन्येभ्यस्तु परावृत्तिरेव शुद्धिर्हि मानसी ॥ ४८ ॥ एतदेव परं तत्त्वज्ञाने साधनमुच्यते । यावन्न हि मनः शुद्धं तावज्ज्ञानं कथं भवेत् ॥ ४९ ॥ शुद्धे मनसि वै ज्ञानं कथं वा न भवेद् ध्रुवम् । उपक्षीर्णं सर्वमत्र साधनं तस्य शोधने ॥ ५० ॥ कर्म वोपासनं वाऽपि वैराग्यादिकमेव वा । मनसः शोधने एव विनियुक्तं न चाऽन्यथा ॥ ५१ ॥ तस्माच्छुद्धेन मनसा भासते तत् परं वपुः । इति राज्ञेरितं श्रुत्वा त्वष्टावक्रः पुनर्जगौ ॥ ५२ ॥ वह जब और जहाँ नहीं है तब वे 'जब' और 'जहाँ' भी सिद्ध नहीं हो सकते । अतः चेतन आत्माका भान होनेके लिये केवल अन्य ( अनात्म ) पदार्थोंके निषेधकी ही अपेक्षा है, किसी नवीन वस्तुको सामने लानेकी नहीं ॥ ४६-४७ पू० ॥ किसी वस्तुकी अभिमुखता न होनेके कारण ही उस परमतत्त्वको अज्ञेय कहा जाता है । इसीसे वह तत्त्व शुद्धचित्तद्वारा ज्ञेय कहा गया है । मनका अन्य वस्तुओंसे विमुख हो जाना ही मनकी शुद्धि है और यही तत्त्वज्ञानकी सबसे प्रधान साधन कही गयी है ॥ ४७ उ०-४९ पू० ॥ जबतक मन शुद्ध न हो तबतक ज्ञान कैसे हो सकता है । और यदि मन शुद्ध है तो निश्चय ज्ञान क्यों नहीं होगा ? इस मनकी शुद्धिमें ही अन्य सम्पूर्ण साधनोंकी समाप्ति हो जाती है ॥ ४९ उ०-५० ॥ कर्म, उपासना तथा वैराग्य आदिका भी उपयोग मनको शुद्ध करनेमें ही है, किसी अन्य प्रयोजनमें नहीं ॥ ५१ ॥ अतः वह परमात्मा शुद्ध चित्तसे ही भासता है।" राजाका यह प्रवचन सुनकर अष्टावक्रने पुनः प्रश्न किया—॥ ५२ ॥