भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

१३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे राजंस्त्वयोक्तमन्येभ्यः परावृत्तिर्हि मानसी । केवला चेत् सा परा चिन्मनसा प्रतिभासते ॥ ५३ ॥ तत् सुषुप्तौ विभासेत परावृत्तं मनस्तदा । तत्र किं साधनैरन्यैः सुप्तिमात्रात् कृतार्थता ॥ ५४ ॥ इति पर्यनुयुक्तोऽथ विप्रेणोवाच भूपतिः । समाहितः शृणु ब्रह्मन् समाधानं वदामि ते ॥ ५५ ॥ सत्यं सुषुप्तौ मनसः परावृत्तिस्तु सर्वथा । लीनं मनस्त्वथाप्यस्य कथं तामवभासयेत् ॥ ५६ ॥ कज्जलेन समालिप्ते दर्पणे गगनं न हि । अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेण भासते क्वचित् ॥ ५७ ॥ “राजन् ! आपने कहा कि यदि मनकी अन्य पदार्थोंसे केवल विमुखता हो जाय तो उस शुद्ध मनसे परम चेतनका भान हो जाता है ॥ ५३ ॥ तब तो सुषुप्तिमें उसका भान होना चाहिये, क्योंकि उस अवस्थामें मन विषयोंसे विमुख रहता ही है। फिर अन्य साधनोंकी क्या अपेक्षा है; काम तो सुषुप्तिमात्रसे ही बन जायगा” ॥ ५४ ॥ अष्टावक्र मुनिके इस प्रकार शंका करनेपर राजा जनक बोले, “ब्रह्मन् ! मैं आपकी शंकाका समाधान करता हूँ, आप एकाग्रचित्त होकर सुनें ॥ ५५ ॥ यह तो ठीक है कि सुषुप्तिमें मनकी विषयोंसे पूर्ण विमुखता हो जाती है, किन्तु उस समय उसकी मनःस्वरूपता¹ भी तो लीन हो जाती है, फिर वह उसे किस प्रकार भासित करेगा ॥ ५६ ॥ यदि दर्पणपर काजल पोत दिया जाय तो अन्य प्रतिबिम्बोंकी निवृत्ति हो जानेपर भी उससे आकाशका भान कभी नहीं हो सकता ॥ ५७ ॥ १. मन पाँचों भूतोंके सात्त्विक अंशका परिणाम है। इसीलिये उससे विषयोंका ज्ञान होता है, क्योंकि ज्ञान सत्त्वगुणका ही धर्म है। सुषुप्तिमें तमोगुणके द्वारा यह सात्त्विक अंश ढक जाता है। अतः जिस प्रकार अन्धकारसे आच्छादित दर्पणमें कोई प्रतिबिम्ब नहीं भासता उसी प्रकार सुषुप्तिमें तमोगुणसे आच्छादित मनमें न तो विषय ही भासते हैं और न शुद्ध चेतन ही।