भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

२३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्ते सम्यक् प्रवक्ष्यामि शृणु सम्यक् समाहितः । मनसस्तु द्विधाऽवस्था प्रकाशामर्शभेदतः ॥ ६४ ॥ बहिरर्थेषु विश्रान्तिर्या प्रकाशः स उच्यते । यस्तद्विचारः स्वस्मिन् वै स विमर्श उदाहृतः ॥ ६५ ॥ प्रकाशो निर्विकल्पः स्याद्वस्तूनामविभेदतः । विमर्शः शब्दसम्भेदद्विभेदात् सविकल्पकः ॥ ६६ ॥ अयमेवंविध इति शब्दसम्भेदवर्जितः । वस्तुदर्शनरूपोऽसौ प्रकाशो निर्विकल्पकः ॥ ६७ ॥ अयमेवंविध इति वस्तुदर्शनमूलकः । शब्दसम्भिन्नरूपोऽसौ विचारात्माऽवभासनः ॥ ६८ ॥ आन्तरोऽभिनवोऽन्यो वा विमर्श इति कीर्त्तितः । अब मैं तुमसे स्पष्टतया कहता हूँ, खूब सावधान होकर सुनो। मनकी दो प्रकारकी अवस्थाएं होती हैं—(१) प्रकाशावस्था और (२) विमर्शावस्था ॥ ६४ ॥ मनका बाह्य विषयोंकी ओरसे शान्त (संकल्पहीन) हो जाना प्रकाशावस्था है और उनका अपनेमें संकल्प होना विमर्श कहा गया है ॥ ६५ ॥ प्रकाश अवस्था निर्विकल्प होती है, क्योंकि उस समय वस्तुओंका भेद नहीं रहता। और वस्तुओंका भेद होनेके कारण शब्दोंका भी भेद रहनेके कारण विमर्शावस्था सविकल्प है ॥ ६६ ॥ ‘यह ऐसा है’ इस प्रकारके शब्दभेदसे रहित और वस्तुतत्त्वका दर्शन करानेवाली यह प्रकाशावस्था निर्विकल्प होती है ॥ ६७ ॥ तथा वस्तुतत्त्वका दर्शन जिसके मूलमें रहता है¹ और ‘यह ऐसा है’ इस प्रकार शब्दभेदमय विचाररूपसे जो भासती है [वह विमर्शावस्था सविकल्प होती है ] ॥ ६८ ॥ विमर्श आन्तर होता है। [अर्थात् मनपर जो बाह्यपदार्थोंका १. क्योंकि प्रत्येक पदार्थकी प्रतीतिके मूलमें उसके अधिष्ठानरूपसे पर- मार्थतत्त्वका स्फुरण होता है; जैसे दर्पणके ज्ञानके बिना प्रतिबिम्बका ज्ञान नहीं हो सकता उसी प्रकार सर्वाश्रयभूता चितिके स्फुरणके बिना किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं हो सकता।