भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

षोडशोऽध्यायः । २३५ तत्र योऽभिनवाऽऽभासः स प्रोक्तोऽनुभवात्मकः ॥ ६९ ॥ अन्यस्मृत्यनुसन्धानात्मकः संस्कारसम्भवः । एवं मनो द्विप्रकारशक्तियुक्तं सदा स्थितम् ॥ ७० ॥ निद्रा प्रकाशरूपाऽसौ सुषुप्तिश्चिरसंस्थिता । जागरामर्शबहुला चेतयमूढदशोच्यते ॥ ७१ ॥ प्रकाशनिबिडा यस्मात् सुषुप्तिर्मूढतात्मिका । अतएव हि दीपादेः प्रकाशनिबिडत्वतः ॥ ७२ ॥ निश्चिता मूढता सर्वैर्विद्वद्भिरपि सर्वथा । प्रतिबिम्ब पड़ता है उसको आश्रय करके होता है ।] यह अभिनव और अन्य रूपसे दो प्रकारका है। इनमें जो अभिनव आभास है वह प्रत्यक्ष अनुभवरूप कहा गया है ॥ ६९ ॥ तथा अन्य जो स्मृति कहा जाता है, अनुसन्धानात्मक होता है । यह पहले अनुभव की हुई वस्तुओंके संस्कारोंसे होता है । इस प्रकार मन सर्वदा इन दो प्रकारकी शक्तियोंसे युक्त रहता है ॥ ७० ॥ यह सुषुप्तावस्था प्रकाश अर्थात् निर्विकल्प ज्ञानरूप होती है तथा चिरकाल तक रहती है तथा जाग्रत् अवस्था में विमर्श (सवि- कल्प ज्ञान) की अधिकता रहती है । इसलिये यह अमूढ अवस्था कहलाती है ॥ ७१ ॥ क्योंकि सुषुप्तिमें घनीभूत प्रकाश (निर्विकल्प ज्ञान) रहता है इसलिये वह मूढतारूप है।१ इसीसे प्रकाशकी प्रचुरता रहनेके कारण सभी विद्वानोंने दीपक आदिकी सर्वथा मूढता ही निश्चय की है। [अर्थात् प्रकाशक होनेपर भी निर्विकल्पताके कारण उन्हें जड ही माना है ] ॥ ७२-७३ पू० ॥ १. सुषुप्तिमें घनीभूत प्रकाश अर्थात् निर्विकल्प ज्ञान रहता है—इसका तात्पर्य यह है कि उस समय विमर्श या सविकल्प ज्ञान बिलकुल नहीं रहता। इसलिये वह मूढतारूप अर्थात् जड होती है । इसी कारण दीपक तथा घट-पटादि भी जड हैं। परन्तु शुद्ध चिति केवल घनीभूत प्रकाश नहीं है अपि तु स्फुरत-प्रकाशनूप हैं । यह स्फुरद्रूपता ही उसकी चितिशक्ति है। इसीको आगमशास्त्रों में स्पन्द या पूर्णा- हम्ता कहा है । इससे सम्पन्न होनेके कारण ही वह अपने संकल्पमात्रसे दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान अपने ही स्वरूपमें दृश्य प्रपञ्च को आभासित कर देती है ।