त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशोऽध्यायः । २३७ विमर्शभेदाद्भेदो हि लक्ष्यते व्यावहारिकैः । तत्र हेतुर्भास्यभेदादित्येव प्रनिश्चयः ॥ ७९ ॥ समाधौ केवलंचितिः सुप्तावव्यक्तमेव च । दर्शने भिन्नभासो हि भास्यमेवं त्रिधा स्थितम् ॥ ८० ॥ भास्यभेदेऽपि भासस्तु केवलं निर्विकल्पकः । अतः प्रकाशनिबिड इत्येव संप्रचक्षते ॥ ८१ ॥ समाधिश्च सुषुप्तिश्च चिरकालभवत्वतः । अनन्तरं स्पष्टतया सर्वैरपि विमृश्यते ॥ ८२ ॥ क्षणिकत्वाद्दर्शनं तु स्पष्टं न हि विमृश्यते । एवं समाधिः सुप्तिश्च क्षणिका न विमृश्यते ॥ ८३ ॥ सुषुप्तिः क्षणिका तद्वत् समाधिरपि विद्यते । सुषुप्तिर्लक्ष्यते सूक्ष्मदृग्भिः परिचयात् खलु ॥ ८४ ॥ किन्तु व्यावहारिक लोगोंको विमर्शका भेद होनेके कारण इनमें भेद जान पड़ता है। इसमें निश्चित बात यह है कि इनका भेद भास्यके भेदके कारण है [ स्वतः नहीं ] ॥ ७९ ॥ समाधिमें केवल शुद्ध चिति रहती है, सुषुप्तिमें अव्यक्त भी है और वस्तुदर्शनमें विभिन्न अवभास रहते हैं । इस प्रकार इन अवस्थाओंमें तीन प्रकारके भास्य हैं ॥ ८० ॥ परन्तु भास्योंका भेद होनेपर भी भास ( दृष्टि ) तो केवल निर्वि- कल्प ही रहता है । इसीसे उसे तीनों अवस्थाओंमें प्रकाशनिबीड ही कहा जाता है ॥ ८१ ॥ समाधि और सुषुप्ति दीर्घकालतक रहती हैं । इसलिये पीछे सभी लोग उनकी स्पष्ट अनुभूति स्वीकार करते हैं ॥ ८२ ॥ किन्तु पदार्थदर्शन ( पदार्थदर्शनकी सन्धियोंमें रहनेवाली निर्वि- कल्पता ) क्षणिक है; इसलिये उसका स्पष्ट परिचय नहीं होता । इसी प्रकार यदि समाधि और सुषुप्ति अवस्थाएँ भी क्षणिक होतीं तो उनका भी परिचय नहीं हो सकता था ॥ ८३ ॥ व्यवहारमें कभी क्षणिक सुषुप्ति और समाधि भी हो जाती हैं। किन्तु दीर्घ सुषुप्तिका परिचय रहनेके कारण सूक्ष्मदर्शी क्षणिक