त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे समाधिस्त्वपरिचयात् सूक्ष्मो न हि विमृश्यते । सर्वेषां प्राणिनां ब्रह्मन् व्यवहारदशास्वपि ॥ ८५ ॥ सूक्ष्माः समाधयः सन्ति चाव्युत्पत्त्या विभान्ति नो । जाग्रत्यविमृशिर्या स्यात् स समाधिरुदीरितः ॥ ८६ ॥ विमर्शाभावमात्रन्तु समाधिरभिधीयते । सुषुप्तौ दर्शने चापि समाधित्वमतः स्थितम् ॥ ८७ ॥ किन्तु मुख्यसमाधित्वमनयोर्न हि विद्यते । भेदामर्शनसंस्कारगर्भितत्वान्न मुख्यता ॥ ८८ ॥ दर्शनं जाग्रति भवेदविमर्शनरूपकम् । तथापि ते प्रवक्ष्यामि मुनिपुत्रादराच्छृणु ॥ ८९ ॥ अव्यक्तं यत् प्रथमजं नास्तिसामान्यकं हि तत् । नास्तीत्येव हि तद्भानमत्यन्ताभावरूपकम् ॥ ९० ॥ सुषुप्तिको तो पहचान लेते हैं। पर समाधिका परिचय है नहीं, इसलिये वस्तुदर्शनके समय जो सूक्ष्म समाधि होती है वह पहचानी नहीं जाती ॥ ८४-८५ पू० ॥ ब्रह्मन् ! व्यवहारके समय भी सभी प्राणियोंको सूक्ष्म समाधियाँ हुआ करती हैं; किन्तु परिचय न होनेके कारण वह जान नहीं पड़तीं ॥ ८५ उ०-८६ पू० ॥ जाग्रत् अवस्थामें जो विमर्श ( संकल्प ) शून्य स्थिति हो जाती है वह समाधि ही कही गयी है। विमर्शका अभाव ही तो समाधि कहलाता है ॥ ८६ उ०-८७ पू० ॥ अतः सुषुप्ति और वस्तुदर्शनके समय भी समाधि तो रहती ही है। किन्तु ये मुख्य समाधि नहीं मानी जातीं। इन अवस्थाओंमें भेदका उल्लेख करानेवाले संस्कार छिपे रहते हैं, इसलिये इन्हें मुख्य समाधि नहीं माना जाता ॥ ८७ उ०-८८ ॥ जाग्रत् अवस्थामें जो पदार्थ-दर्शन है वह भी अविमर्शरूप ही है। तथापि मैं इसका स्पष्टतया वर्णन करता हूँ। मुनिपुत्र ! आदरपूर्वक सुनो ॥ ८९ ॥ सबसे पहले उत्पन्न हुआ जो अव्यक्त है वह नास्ति-सामान्यरूप है। 'कुछ भी नहीं है' इस प्रकार उसका भान अत्यन्त अभावरूप ही है ॥९०॥