त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः श्रुतवैवं जनकेनोक्तमष्टावक्रः पुनर्नृपम् । पप्रच्छ यत्तद्वदामि शृणु भार्गव यत्नतः ॥ १ ॥ राजन् यदुक्तं भवता व्यवहारदशास्वपि । सूक्ष्माः समाधयः सन्तीत्येतं तन्मे वद स्फुटम् ॥ २ ॥ दशासु कासु ते सन्ति निर्विकल्पचिदात्मकाः। एवं तेनाऽनुयुक्तोऽथ प्राह राजा महाशयः ॥ ३ ॥ शृणु ब्रह्मन् प्रवक्ष्यामि व्यवहारे समाधयः । प्रियया सम्परिष्वक्तो नव्यया प्रथमं यदा ॥ ४ ॥ तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः । तिष्ठेन्न निद्रयाऽऽक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ५ ॥ सप्तदश अध्याय ॥ १७ ॥ जनक द्वारा साधनक्रम और स्वानुभवका निरूपण परशुरामजी ! जनकका यह कथन सुनकर अष्टावक्रजीने राजासे पुनः जो प्रश्न किया वह बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ १ ॥ [अष्टावक्रजीने पूछा ] "राजन् ! आपने जो कहा कि व्यवहारके समय भी सूक्ष्म समाधियाँ हुआ करती हैं, सो यह बात आप मुझसे स्पष्ट करके कहिये ॥ २ ॥ वे निर्विकल्प चित्स्वरूपिणी समाधियाँ किन-किन स्थितियोंमें हुआ करती हैं ?" अष्टावक्रके इस प्रकार प्रश्न करनेपर उदारचेता महाराज जनक कहने लगे—॥ ३ ॥ "ब्रह्मन् ! सुनिये, मैं व्यवहारमें होनेवाली समाधियाँ बतलाता हूँ। पुरुष जिस समय नवीन प्रियतमासे पहली बार गाढ़ आलिंगन प्राप्त करता है उस समय एक क्षणके लिये उसे बाहर या भीतरकी कुछ भी सुधि नहीं रहती और न निद्राके ही वशीभूत होता है। अतः वह समाधि ही कही जाती है ॥ ४-५ ॥