भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

सप्तदशोऽध्यायः। २४१ यच्चिराद्वाञ्छितं किञ्चिदलभ्यत्वेन निश्चितम् । अकस्मात्तस्य संप्राप्तिर्यदा भवति वै मुने ॥ ६ ॥ तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः । तिष्ठेन्न निद्रयाक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ७ ॥ अतर्कितं व्रजन् क्वापि निर्भयो हृष्टमानसः । अकस्माद्यदि सम्पश्येद् व्याघ्रादिं मृत्युसम्मितम् ॥ ८ ॥ तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः । तिष्ठेन्न निद्रयाक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ९ ॥ अतिप्रियं स्वपुत्रादि विभुं च गृहकर्मणि । अरोगिणं यदाऽकस्मात् संशृणोति मृतं किल ॥ १० ॥ तदा न वेद बाह्यं वाप्यान्तरं वा क्षणं नरः । तिष्ठेन्न निद्रयाक्रान्तः स समाधिरुदीरितः ॥ ११ ॥ अथान्यथापि वक्ष्यामि समाधेः सम्भवं शृणु । जिस वस्तुकी चिरकालसे लालसा रही हो और उसे अलभ्य समझ बैठे हों, हे मुने ! उसकी जिस समय अकस्मात् प्राप्ति हो जाती है उस समय भी मनुष्यको कुछ देरतक बाहर या भीतरकी सुधि नहीं रहती और न वह निद्राके ही वशीभूत होता है । वह भी समाधि ही कही गयी है ॥ ६-७ ॥ जिस समय मनसे किसी प्रकारकी कल्पना न हो तथा निर्भय और प्रसन्न चित्तसे कहीं जा रहा हो, उसी समय अकस्मात् यदि मार्गमें व्याघ्र आदि कोई कालके समान विकराल जीव दिखायी दे जाय, तब भी एक क्षणके लिये बाहर-भीतरकी कोई सुधि नहीं रहती और न निद्राके ही वशीभूत होता है । उसे भी समाधि ही कहा जाता है ॥ ८-९ ॥ अपना पुत्रादि कोई अत्यन्त प्रिय हो, जो नीरोग और गृहकार्योंमें भी अत्यन्त कुशल हो, उसके विषयमें यदि अकस्मात् सुन लिया जाय कि वह मर गया, तो उस समय भी मनुष्यको एक क्षणके लिये बाहर-भीतरकी कुछ भी सुधि नहीं रहती और न वह निद्रासे ही आक्रान्त होता है। उसे भी समाधि ही कहा जाता है ॥ १०-११ ॥ इनके सिवा समाधिकी अन्य स्थितियाँ भी बतलाता हूँ, श्रवण