भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

२४२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तीनां मध्ये सान्ते समाधयः ॥ १२ ॥ दूरे किञ्चित् पश्यतस्तु बुद्ध्या चैकाग्रया मुने । मनो दीर्घात्मतां याति जलूकेव तृणालिषु ॥ १३ ॥ देहे देहाभासमयं भावे भावात्मकं तथा । मध्ये तन्निर्विकल्पाख्यं मनो लक्ष्यं सर्वदा ॥ १४ ॥ वहुना किमिहोक्तेन शृणु सूक्ष्मविमर्शनम् । व्यवहारे न कस्यापि ज्ञानमेकन्तु भासते ॥ १५ ॥ खण्डज्ञानसमूहात्मा व्यवहारोऽयमाततः । अत एव वर्णयन्ति तैर्थिकाः सर्व एव हि ॥ १६ ॥ आत्मानं बुद्धिमपि वा क्षणभेदविभेदितम् । तदन्तरक्षणौघेषु निर्विकल्पदशा स्थिता ॥ १७ ॥ कहोलात्मज जानीहि जानतां तु प्रतिक्षणम् । समाधिरस्ति चान्यस्य समाधिः शशशृङ्गवत् ॥ १८ ॥ करो। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिके मध्यमें जो सन्धि-स्थान हैं उनमें भी समाधियाँ रहती हैं ॥ १२ ॥ मुने ! जब एकाग्र चित्तसे कोई दूरकी वस्तु देखी जाती है तो घासपर चलनेवाली जोंकके समान मन भी लम्बा हो जाता है। इसी प्रकार वह शरीरमें रहते समय शरीराकार तथा अन्य किसी भावमें रहनेपर तदाकार हो जाता है। किन्तु किसी भावमें न जाकर बीचमें रहता है तो मनको सर्वदा निर्विकल्प पाओगे ॥ १३-१४ ॥ हे सूक्ष्मदर्शिन् ! इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय; सुनो। व्यवहारके समय किसीको भी सर्वदा एक ही ज्ञान तो भासता नहीं है। यह विस्तृत व्यवहार खण्ड-खण्ड ज्ञानोंका समूह ही तो है। अतः सभी मतवादी आचार्य आत्मा और बुद्धिको भी क्षण-क्षणमें भिन्न- भिन्न बताते हैं। इन समस्त क्षणोंके बीचमें जो क्षणिक अवकाश रहता है उसमें निर्विकल्प स्थिति रहती है ॥ १५-१७ ॥ अष्टावक्र ! याद रखो, जिन्हें समाधिके स्वरूपका ज्ञान है उनके लिये तो प्रत्येक क्षणमें समाधि रहती है; नहीं तो दूसरे पुरुषोंके लिये तो समाधि खरगोशके सींगकी तरह है ही नहीं” ॥ १८ ॥