त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निवृत्तिस्तस्य तु ज्ञानादेवेति प्रविभावितम् । तज्ज्ञानं सविकल्पं स्यादज्ञानस्य प्रबाधनम् ॥ २६ ॥ निर्विकल्पकविज्ञानादज्ञानं न निवर्तते । निर्विकल्पकविज्ञानं केनचिन्न विरुद्ध्यते ॥ २७ ॥ निर्विकल्पकविज्ञानं सविकल्पसमाश्रयम् । विचित्रचित्राभासानां भित्तिवत् सुव्यवस्थितम् ॥ २८ ॥ निर्विकल्पं ज्ञानमिति केवलं ज्ञानमुच्यते । तत्रैव हि विकल्पानामुल्लेखात् सविकल्पकम् ॥ २९ ॥ अज्ञानं सविकल्पाख्यज्ञानमेव न चेतरत् । तदनेकविधं कार्यकारणात्मतया स्थितम् ॥ ३० ॥ कारणं स्वात्मपूर्णत्वाख्यातिरूपमुदीरितम् । चिदात्मा पूर्ण एव स्यादवच्छेदविवर्जनात् ॥ ३१ ॥ अवच्छेदनहेतूनां कालादीनां हि साधकः । इसकी निवृत्ति केवल ज्ञानसे ही मानी गयी है । वह अज्ञानकी निवृत्ति करनेवाला ज्ञान सविकल्प होना चाहिये ॥ २६ ॥ निर्विकल्प ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि निर्विकल्प ज्ञानका किसीसे विरोध नहीं होता ॥ २७ ॥ जिस प्रकार तरह-तरहके चित्रोंकी आश्रय भित्ति होती हैउ सी प्रकार निर्विकल्प विज्ञान तो सम्पूर्ण विकल्पोंके आश्रय रूपसे स्थित है ॥२८॥ निर्विकल्प ज्ञान ही 'केवल ज्ञान' ( शुद्ध ज्ञान ) कहा जाता है और उसीमें जब विकल्पोंका उदय होता है तब वह सविकल्प हो जाता है ॥ अज्ञान भी सविकल्प कहलानेवाला ज्ञान ही है, और कुछ नहीं। वह कार्य-कारण भावसे अनेक रूपोंमें स्थित है ॥ ३० ॥ अपने आत्माकी पूर्णताका भान न होना ही कारण अज्ञान कहा गया है। चिदात्मा तो पूर्ण ही है, क्योंकि उसकी कोई सीमा नहीं है, प्रत्युत वह तो सीमाके हेतुभूत कालादिको भी सिद्ध करनेवाला है। [ अर्थात् सीमा या अवच्छेदक हेतु जो देश, काल और वस्तु हैं उनकी सत्ता तो चेतनके आश्रित ही भासती है, फिर वे उसके अवच्छेद- दक कैसे हो सकते हैं ? ] ॥ ३१-३२ पू० ॥