त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः। २४५ तथाविधात्मनः ख्यातिरपूर्णत्वेन या स्थिता ॥ ३२ ॥ अत्राधुनास्मीतिरूपा मूलाज्ञानं हि सा भवेत् । तस्यैवं पल्लवप्रायं देहात्मत्वादिभासनम् ॥ ३३ ॥ अज्ञानस्य निवृत्त्यन्तं संसारो न निवर्त्तते । पूर्णात्मविज्ञानमृते त्वज्ञानं नातिवर्त्तते ॥ ३४ ॥ तच्च पूर्णात्मविज्ञानं द्विविधं सुव्यवस्थितम् । परोक्षमपरोक्षञ्च परोक्षं गुरुशास्त्रतः ॥ ३५ ॥ तत् साक्षात् पुरुषार्थस्य न कारणमिति स्थितम् । यादृशं ते भवेज्ज्ञानं शास्त्रश्रुतिसमुद्भवम् ॥ ३६ ॥ श्रद्धामात्राभ्युपगतं फलदं न प्रचक्षते । अपरोक्षं हि विज्ञानं समाधिपरिपाकजम् ॥ ३७ ॥ सप्रपञ्चाज्ञाननाशक्षमं शुभफलावहम् । इस प्रकारके आत्माका जो 'उस समय मैं यहाँ हूँ' इस प्रकार अपूर्ण- रूपसे भान होना है वही मूल (कारण) अज्ञान है। देहात्मत्वादि¹ रूपसे भासना उसीका कार्य है ॥ ३२ उ०-३३ ॥ जबतक अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती तबतक संसारका अन्त नहीं होता और आत्माको पूर्णताका ज्ञान हुए बिना अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती ॥ ३४ ॥ वह आत्माकी पूर्णताका ज्ञान दो प्रकारका है—परोक्ष और अपरोक्ष। इनमें परोक्ष ज्ञान तो गुरु या शास्त्रसे होता है। परन्तु वह मोक्षरूप पुरुषार्थका साक्षात् साधन नहीं है—यह बात निश्चित है ॥ ३५-३६ पू० ॥ जैसा शास्त्र और श्रुतिसे उत्पन्न हुआ तुम्हारा ज्ञान है, जो केवल श्रद्धासे ही मान लिया गया है, वह मोक्षरूप फल देनेवाला नहीं कहा गया ॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ अपरोक्ष ज्ञान तो समाधिका परिपाक होने पर उत्पन्न होता है। तथा वही प्रपञ्चसहित अज्ञानका नाश करनेमें समर्थ और मोक्षरूप शुभ फल १. देहके धर्म स्थूलत्व गौरत्वादिको अपनेमें आरोपित 'मैं मोटा हूँ' 'मैं गोरा' इत्यादि रूपसे भासना।