त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे समाधिर्ज्ञानपूर्वस्तु विज्ञानं जनयेत् खलु ॥ ३८ ॥ तस्मादज्ञानिनां नार्थः समाधौ सम्भवत्यपि । यथाऽविदितमाणिक्यः पश्यन् कोशगृहे मणिम् ॥ ३९ ॥ न जानाति यथान्यस्तु श्रुतज्ञातमणिः कचित् । दृष्ट्वा प्रत्यभिजानाति तत्परो मणिमञ्जसा ॥ ४० ॥ अतः परः श्रुतमपि भूयः पश्यन् मणिं कचित् । न विजानाति तदिह ब्रह्मन् सुनिपुणोऽपि सन् ॥ ४१ ॥ तथा मूढा न विन्दन्ति फलं विज्ञानसंश्रयम् । अज्ञातत्वात् पण्डितास्तु श्रुतज्ञानयुता अपि ॥ ४२ ॥ अतत्परत्वहेतोस्तु न विजानन्ति सर्वथा । यथा हि तारकां पश्यन्नपि जानाति न कचित् ॥ ४३ ॥ मूढः श्रुतज्ञानहीनः श्रुतज्ञानयुतोऽपि वै । देनेवाला होता है । जो समाधि ज्ञानपूर्वक होती है निश्चय वही अप- रोक्ष ज्ञान उत्पन्न कर सकती है ॥ ३७ उ०-३८ ॥ अतः व्यवहारकालमें अज्ञानियोंको समाधि होते रहनेपर भी उनसे मोक्षरूप पुरुषार्थकी प्राप्ति नहीं होती । जिस प्रकार मणिके विषय- में कुछ भी न जाननेवाला पुरुष खजानेमें मणिको देखनेपर पहचान नहीं सकता, किन्तु जिसने सुनकर मणिकी जानकारी प्राप्त कर ली है और उसकी खोजमें लगा हुआ है, वह उसे देखनेपर सुगमतासे ही पहचान लेता है ॥ ३६-४० ॥ किन्तु ब्रह्मन् ! जिसे उसकी खोज नहीं है उसने भले ही मणिके विषयमें सुन रखा हो और स्वयं भी बड़ा चतुर हो, तो भी मणिको देखनेपर उसे पहचान नहीं सकता ॥ ४१ ॥ उसी प्रकार अज्ञानी पुरुषोंको तो परिचय न होनेके कारण [ व्यवहारमें समाधि होते रहनेपर भी ] तत्त्वज्ञानसे होनेवाला फल प्राप्त नहीं होता । और जो पण्डित हैं, वे श्रवणजनित ज्ञानसे सम्पन्न होनेपर भी, उसकी खोजमें लगे न होनेके कारण उसे ठीक-ठीक नहीं जान पाते ॥ ४२-४३ पू० ॥ [ यह बात ऐसी ही है ] जैसे आकाशमें तारेको देखनेपर भी