त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः । २४७ पश्यन्नपि च नो वेत्ति तत्परत्वविवर्जनात् ॥ ४४ ॥ यस्तु श्रुत्वा शुक्रतारां दिगाकारादिलक्षणैः । मया ज्ञेयं सर्वथेति तत्परो बुद्धिमान् नरः ॥ ४५ ॥ एकाग्रमानसः पश्यन् प्रत्यभिज्ञास्यति स्फुटम् । एवमज्ञानतो मूढाश्चान्ये तात्पर्यवर्जनात् ॥ ४६ ॥ न विजानन्ति स्वात्मानं ब्रह्मन् सत्सु समाधिषु । भिक्षामटति दुर्दैवाद् यथा वै विस्मृताकरः ॥ ४७ ॥ तस्मादेता दशाः सर्वाः समाधीनां निरर्थकाः । अत एव शिशूनां हि सर्वदा निर्विकल्पकम् ॥ ४८ ॥ न फलं साधयेद् ब्रह्मन्नज्ञानस्यानिवृत्तितः । अज्ञानी तो श्रवणजनित ज्ञानसे हीन होनेके कारण नहीं पहचान पाता । और जिसे श्रवणजनित ज्ञान है, उसमें उसे देखने की उत्कण्ठा न होनेके कारण, वह भले ही उसे देखता रहे परन्तु पहचान नहीं सकता ॥ ४३ उ०-४४ ॥ जिसने शुक्र तारेके विषयमें 'वह अमुक दिशामें रहता है और उसका ऐसा आकार है' इत्यादि लक्षणोंसे सुन रखा है और जिसे ऐसी उत्कण्ठा भी है कि मैं उसे अपरोक्ष रूपसे जानूँ, वह बुद्धिमान् पुरुष ही एकाग्रचित्तसे देखनेपर उसे स्पष्टरूपसे जान सकेगा [ अन्य नहीं ] ॥ ४५-४६ पू० ॥ ब्रह्मन् ! इसी प्रकार 'समाधियोंके होते रहनेपर भी अज्ञानी तो अज्ञानके कारण और दूसरे लोग तत्परता न होनेके कारण अपने आत्माको नहीं जान पाते, जिस प्रकार दुर्भाग्यवश घरमें गड़े खजानेका पता न होनेके कारण कोई पुरुष भीख माँगता फिरे ॥ ४६ उ०-४७ ॥ इसलिये समाधिकी ये सब दशाएँ निरर्थक ही रहती हैं । इसीसे शिशुओंको यद्यपि सर्वदा निर्विकल्प स्थिति ही रहती है तथापि उनके अज्ञानकी निवृत्ति न होनेके कारण उन्हें उसका मोक्षरूप फल प्राप्त नहीं होता ॥ ४८-४९ पू० ॥