त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे प्रत्यभिज्ञात्मकं यत्तु ज्ञानं स्यात् सविकल्पकम् ॥ ४९ ॥ तदेव संसारमूलमज्ञानं विनिवर्त्तयेत् । अनेकजन्मसुकृतैः सन्तुष्टा स्वात्मदेवता ॥ ५० ॥ यदा तदा मुमुक्षत्वं नान्यदा कल्पकोटिभिः । चेतनत्वं जन्मवत्सु परमं दुर्लभं भवेत् ॥ ५१ ॥ सुदुर्लभं तेष्वपि च मानुषं जन्म सर्वथा । तत्रापि सूक्ष्मबुद्धित्वमत्यन्तं हि सुदुर्लभम् ॥ ५२ ॥ पश्य ब्रह्मन् स्थावराणां शतांशेनापि सम्मितम् । न दृश्यते जङ्गमं वै तेषामपि शतांशतः ॥ ५३ ॥ समं नास्ति मनुष्यत्वं तत्रापि परिभावय । पशुतुल्याः प्रदृश्यन्ते मनुष्याणां हि कोटयः ॥ ५४ ॥ ये न जानन्ति सदसत् पुण्यं वा पापमेव वा । अन्येऽपि कोटिशो मर्त्याः प्रवृत्ताः कामनापराः ॥ ५५ ॥ जो ज्ञान प्रत्यभिज्ञात्मकं और सविकल्प होता है वही संसारके हेतुभूत अज्ञानकी निवृत्ति कर सकता है ॥ ४९ उ०-५० पू० ॥ जब अनेक जन्मोंमें किये हुए शुभ कर्मों द्वारा आत्मदेव प्रसन्न होते हैं तब मनुष्यको मोक्षकी इच्छा होती है, नहीं तो करोड़ों कल्पोंमें भी ऐसा सुअवसर प्राप्त नहीं होता ॥ ५० उ०-५१ पू० ॥ संसारमें जन्म लेनेवालोंमें चेतन प्राणी होना अत्यन्त कठिन है। उनमें भी मनुष्य जन्म पाना तो सभी प्रकारसे बहुत कठिन है। तथा मनुष्योंमें भी सूक्ष्मबुद्धि युक्त होना तो बहुत ही कठिन है ॥५१ उ०-५२॥ ब्रह्मन् ! देखो, स्थावरोंकी अपेक्षा जंगम ( चलने-फिरनेवाले ) जीव सौवें अंश भी दिखायी नहीं देते। मनुष्य उनके सौवें अंशके बराबर भी नहीं हैं। उनमें भी करोड़ों मनुष्य पशुओंके समान दिखायी देते हैं, जिन्हें सत्य-असत्य अथवा पुण्य-पापका भी कोई ज्ञान नहीं है ॥ ५३--५५ पू० ॥ उनके अतिरिक्त और भी करोड़ों मनुष्य कामनाओंके पीछे लगकर १. पूर्व श्रुतका साक्षात परिचय करानेवाला।