भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

सप्तदशोऽध्यायः। २४६ गतागतं रोचयन्ते पाण्डित्याभासगर्विताः। एवंविधजनानां तु केऽप्यन्ये बुद्धिमद्विधाः॥ ५६ ॥ मालिन्यशेषचित्तास्तेऽप्यद्वैतपदनास्तिकाः । भगवन्माययाच्छन्नमद्वैतं परमं पदम् ॥ ५७ ॥ कथं सर्वैः समासाद्यं मायान्धैर्मन्दभाग्यकैः। मायान्धानां तत्पदं तु न बुद्धिसुपरोहति ॥ ५८ ॥ अन्ये दुर्भागधेयास्ते बुद्ध्यारूढमपीह ये। वृथाभिनिविशन्ति भूयोऽपह्नुवन्ति कुकल्पनैः ॥ ५९ ॥ अहो भगवती माया पश्यन्तोऽपि महत्पदम्। चिन्तामणि हस्तगतं त्यजन्ति हि कुकल्पनैः॥ ६० ॥ प्रवृत्तिमार्गमें जुटे हुए हैं। अपनी पण्डिताईके भ्रमसे गर्वित रहनेके कारण उन्हें स्वर्गादि अनित्य फलोंमें ही रुचि होती है ॥ ५५ उ०-५६ पू० ॥ इस प्रकारके लोगोंमें भी कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें बुद्धिमान् कहा जा सकता है। किन्तु उसके चित्तमें मलदोषका अंश शेष रहनेके कारण अद्वैत पदमें उनकी भी आस्था नहीं होती ॥ ५६ उ०-५७ पू० ॥ यह अद्वैत परमपद तो भगवान्‌की मायासे ढका हुआ है। अतः जो मन्दभाग्य पुरुष मायासे अन्धे रहते हैं उन सबकी इसतक कैसे पहुँच हो सकती है? इसीसे मायामुग्ध पुरुषोंकी बुद्धिमें वह पद नहीं आ सकता ॥ ५७ उ०-५८ ॥ कोई ऐसे अभागे होते हैं कि उनकी बुद्धिमें आ जानेपर भी वे वृथा आग्रहों१में फँस कर तरह-तरहकी कुकल्पनाएँ२ करके उससे हाथ धो बैठते हैं ॥ ५९ ॥ अहो! भगवान्‌की माया कैसी प्रबल है कि इस महान् पदको देख लेनेपर भी तरह-तरहकी कल्पनाएँ करके इस हाथमें आयी हुई चिन्ता- मणिको फेंक देते हैं ॥ ६० ॥ १. यह दृश्य प्रपञ्च कैसे मिथ्या हो सकता है—इत्यादि आग्रहोंमें। २. विषयके बिना तो कोई ज्ञान हो ही नहीं सकता, अतः ये घटादिविषय सत्य हैं—इत्यादि कुतर्क करके। ३. अद्वैतात्मबोध सम्पूर्ण कामनाओंकी शान्ति कर देनेके समान है। परन्तु दुरा- ग्रह और कारण उसे काँच समझकर फेंक देते हैं।