भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

२५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे येषां समाराधनेन तुष्टा सा स्वात्मदेवता । ते मायया विनिर्मुक्ताः सुतर्काः श्रद्धया युताः ॥ ६१ ॥ पराद्वये समाश्वस्ताः प्राप्नुवन्ति परं पदम् । तत्क्रमं तेऽभिधास्यामि ब्रह्मन् संशृणु संयतः ॥ ६२ ॥ अनन्तजन्मसुकृतैर्देवताभक्तिराप्यते । तया संराध्य सुचिरं तत्प्रसादात्ततः परम् ॥ ६३ ॥ वैरस्यं भोगवृन्देषु तत्परत्वञ्च प्राप्नुयात् । वैराग्यतत्परत्वाभ्यां श्रद्धया चापि सङ्गतः ॥ ६४ ॥ सद्गुरुं प्राप्य तत्प्रोक्त्या वेत्त्यद्वैतं परं पदम् । एतज्ज्ञानं परोक्षं वै ह्यस्त्यद्वैतमितीह यत् ॥ ६५ ॥ ततो विचारयेत् सम्यगद्वैतं स्वात्मदैवतम् । उपपाद्य सुतर्कैस्तु संशयांस्तेन नाशयेत् ॥ ६६ ॥ जिन सत्पुरुषोंकी आराधनासे वह आत्मदेव प्रसन्न हो जाते हैं, वे मायासे छूटकर शास्त्रानुसारी तर्क और श्रद्धासे सम्पन्न होते हैं तथा उस परम अद्वैत पदमें परिनिष्ठित होकर उसे प्राप्त कर लेते हैं ॥ ६१-६२ पू० ॥ ब्रह्मन् ! मैं उस पदकी प्राप्तिका क्रम बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। अनन्त जन्मोंके पुण्य होनेपर तो इष्टदेवकी भक्ति प्राप्त होती है। उस भक्तिके द्वारा इष्टदेवकी चिरकालतक आराधना करके फिर उन्हींकी कृपासे भोगोंमें अरुचि और उस पदको प्राप्त करनेकी उत्कण्ठा प्राप्त होती है ॥ ६२ उ०-६४ पू० ॥ वैराग्य, तत्परता और श्रद्धासे सम्पन्न होकर साधक सद्गुरुकी शरणमें जाता है और उनके उपदेशसे उस अद्वैत परमपदका ज्ञान प्राप्त करता है। यह ज्ञान परोक्ष ही होता है, क्योंकि इससे केवल इतना विश्वास हो जाता है कि 'अद्वैत है' ॥ ६४ उ०-६५ ॥ फिर अपने अद्वैत आत्मदेवका अच्छी तरह विचार करना चाहिये और सत्तर्कोंके द्वारा उसका निश्चय करके संशयोंकी निवृत्ति करनी चाहिये ॥ ६६ ॥