त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः। २५१ अथ निश्चितमात्माख्यतत्त्वमद्वयमादरात् । अनुध्यायेदापरोक्षं हठवृत्त्यापि यत्नतः ॥ ६७ ॥ ततो विकल्पविषयीकृत्य ध्यातं परं पदम् । संसारमूलमज्ञानं नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ६८ ॥ पक्वध्याने निर्विकल्पे समाध्याख्ये परं पदम् । आसाद्य पश्चात् संस्मृत्य प्रत्यभिज्ञानवान् भवेत् ॥ ६९ ॥ सोऽद्वैतात्माऽहमस्मीति त्वपरोक्षविकल्पतः । संसारमूलमज्ञानं साङ्गं नाशयति द्रुतम् ॥ ७० ॥ ध्यानस्य परिपाको हि विकल्पपरिवर्जनम् । विकल्पो विविधख्यातिरेकथा निर्विकल्पकः ॥ ७१ ॥ अन्यानुल्लेखमात्रेण विकल्पो वर्जितो भवेत् । विकल्पे वर्जिते पश्चान्निर्विकल्पं स्वतः स्थितम् ॥ ७२ ॥ इस प्रकार निश्चित हुए अद्वय आत्मतत्त्वका आदरपूर्वक निरन्तर अपरोक्ष साक्षात्कार होनेतक निदिध्यासन करना चाहिये। ऐसा प्रयत्न- पूर्वक बलात्कार करता रहे ॥ ६७ ॥ फिर तो 'वह परमपद मैं ही हूँ' ऐसे विकल्प (प्रत्यभिज्ञा) को रखकर ध्यान किये जानेपर वह परमपद संसारके मूल कारण अज्ञानका नाश कर ही देगा—इसमें सन्देह नहीं ॥ ६८ ॥ निर्विकल्प समाधि रूपसे ध्यानका परिपाक होनेपर उस पदकी प्राप्ति होगी। फिर उसीका स्मरण रखते हुए 'मैं वही हूँ' ऐसी प्रत्य- भिज्ञासे युक्त रहे ॥ ६९ ॥ वह 'अद्वैत आत्मा मैं हूं' ऐसा अपरोक्ष विकल्प रहनेसे वह तत्त्व- ज्ञान तत्काल ही संसारके मूल अज्ञानको उसके अंगोंके सहित नष्ट कर देता है ॥ ७० ॥ विकल्पका न रहना ही ध्यानका परिपाक है। विकल्प अनेक प्रकार- के ज्ञानको कहते हैं और निर्विकल्प स्थिति एकरूप होती है ॥ ७१ ॥ आत्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुका स्फुरण न होनेसे ही विकल्पकी निवृत्ति हो जाती है। और विकल्पके न रहनेपर फिर निर्विकल्पता स्वतः ही रह जाती है ॥ ७२ ॥