भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 404 में से

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पृष्ठ 266

२५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे चित्रे विमृष्टे यद्वत्तु शुद्धा भित्तिर्हि संस्थिता । सम्पादनं शुद्धभित्तेश्चित्रसम्मार्जनैव हि ॥ ७३ ॥ एवं विकल्पस्यापोहे निर्विकल्पं मनः स्वतः । निर्विकल्पात्मसम्पत्तिर्विकल्पत्याग एव हि ॥ ७४ ॥ नातोऽधिकं किञ्चिदस्ति पदं प्राप्यं हि पावनम् । अत्र मुह्यन्ति विबुधा अपि मायामहित्वतः ॥ ७५ ॥ सुबुद्धानां क्षणेनैव पदमेतद्धि लक्षितम् । त्रिधाऽधिकारिणो ब्रह्मन्नुत्तमाधममध्यमाः ॥ ७६ ॥ उत्तमाः सकृदादेशकाले बुद्ध्यन्ति तत्पदम् । विचारो ध्यानमपि च श्रुतिकालसमं भवेत् ॥ ७७ ॥ उत्तमानां न हि क्लेशः प्राप्तौ तस्य पदस्य हि । अहं पुरा निदाघस्य रात्रौ ज्योत्स्नासुमण्डिते ॥ ७८ ॥ प्रियया सम्परिष्वक्तो विकसद्वाटिकाङ्गणे । जिस प्रकार चित्रके मिट जानेपर स्वच्छ भीत ही रह जाती है। अतः चित्रको मिटा देना ही स्वच्छ भीत तैयार करना है ॥ ७३ ॥ इसी प्रकार विकल्पके निवृत्त होनेपर मन स्वतः निर्विकल्प हो जाता है। अतः विकल्पका त्याग ही निर्विकल्प आत्माकी उपलब्धि है ॥७४॥ इससे अधिक और कोई पवित्र पद प्राप्त करने योग्य नहीं है। किन्तु मायाकी महिमासे इसमें बड़े बुद्धिमान् भी भ्रमित हो जाते हैं ॥ ७४ ॥ शुद्ध बुद्धिवाले पुरुषोंको तो एक क्षणमें ही इस पदका साक्षात्कार हो जाता है। ब्रह्मन् ! इसके अधिकारी तीन प्रकारके होते हैं—उत्तम, मध्यम और अधम ॥ ७६ ॥ उत्तम तो एकबार बतलाने पर ही उस पदको समझ जाते हैं। उन्हें श्रवणके समय ही उसके विचार (मनन) और ध्यान (निदि- ध्यासन) भी हो जाते हैं। उस पदकी प्राप्तिमें उत्तम अधिकारियोंको कुछ भी कठिनता नहीं होती ॥ ७७-७८ पू० ॥ पुरानी बात है। गर्मीके दिन थे। रात्रिका समय था। भूतलमें चाँदनी छिटक रही थी। मैं एक हरे-भरे बगीचेके आँगनमें बहुमूल्य

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