त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः। २५३ पराङ्कर्यशयनासीनो मदिरामदघूर्णितः ॥ ७९ ॥ अश्रौषं खे सिद्धगणवचनं मधुपेशलम् । अद्वैतत्वाश्रितं चैव तत्काले ह्यविदं पदम् ॥ ८० ॥ विज्ञातं तद्विचारेण ध्यानेनापि तदेव हि । एवमर्द्धमुहूर्त्तेन ज्ञात्वा तत्पावनं पदम् ॥ ८१ ॥ मुहूर्त्तमभवं भूयस्तत्समाहितमानसः । परमानन्दवाराशिपरिमग्नो ह्यशेषतः ॥ ८२ ॥ अथ स्मृतिं समासाद्य विचारपरमोऽभवम् । अहोऽद्भुतपदं ह्येतदानन्दामृतनिर्भरम् ॥ ८३ ॥ अपूर्वमासादितं मे भूयस्तत् संविशाम्यहम् । नैतस्य लेशमात्रं स्यादैन्द्रादिसुखमप्यलम् ॥ ८४ ॥ आब्रह्म सुखमेतस्य लेशतोऽपि न सम्मितम् । अद्यावधि व्यर्थ एष कालो मे व्यतिवाहितः ॥ ८५ ॥ सेजपर बैठा था। मेरी प्रियतमाने मुझे आलिंगित किया हुआ था और मेरे नेत्र मदिराके मदसे चंचल हो रहे थे। इसी समय मैंने आकाशमें सिद्धगणोंके मधुके समान मधुर शब्द सुने। वे अद्वैततत्त्वका निरूपण करनेवाले थे। बस, उसी समय मुझे उस परमपदका ज्ञान हो गया ॥ ७८ उ०-८० ॥ उसी समय विचार और ध्यानके द्वारा भी मैंने उसे जान लिया। इस प्रकार आधे मुहूर्त्तमें ही उस पवित्र पदको जानकर मैं एक मुहूर्त्ततक उसीमें समाहित रहा और पूर्णतया परमानन्द समुद्रमें निमग्न हो गया ॥ ८१-८२ ॥ फिर सावधान होनेपर मैं इस प्रकार विचार करने लगा—'अहो ! यह पद तो बड़ा ही विचित्र है। यह तो आनन्दामृतसे लबालब भरपूर है ॥ ८३ ॥ आज मुझे यह अभूतपूर्व स्थान मिला है। मैं पुनः उसीमें प्रवेश करता हूँ। इन्द्रादि महत्पदोंके सुख तो इसके लेशमात्र भी नहीं हैं ॥ ८४ ॥ ब्रह्मलोकतकका सुख इसके कणमात्रसे भी तुलना नहीं कर सकता। आज तक तो मैंने वृथा ही अपना समय नष्ट किया ॥ ८५ ॥