त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अविदित्वा स्वं निधानं चिन्तामणिगणान्वितम् । यथा भिक्षामटति वै मुष्टिपिष्टप्रलिप्सया ॥ ८६ ॥ अहो लोकास्तथा स्वात्मानन्दाज्ञानविमोहिताः । बाह्यं सुखं लेशमात्रं प्राप्नुवन्ति महाश्रमैः ॥ ८७ ॥ तदलं मे वृथा बाह्यसुखलेशपरिश्रमात् । अनन्तानन्दसन्दोहतत्परः स्यां हि सर्वदा ॥ ८८ ॥ अलमेतेन बाह्येन व्यवहारेण मे किमु । पिष्टपेषणकल्पेन चोपालम्भपदेन वै ॥ ८९ ॥ तानि भोज्यानि तान्येव माल्यानि शयनानि च । भूषणानि विचित्राणि योषित्सम्भोगकाश्च ते ॥ ९० ॥ चिरपर्युषितप्रायाण्यपि संसेव्यतः पुनः । गतानुगतिकत्वान्मे जुगुप्सा न हि जायते ॥ ९१ ॥ इति निश्चित्य भूयोऽहं यावदन्तर्मुखोद्यतः ।
जैसे कोई चिन्तामणियोँसे भरे हुए अपने खजानेको न जाननेके कारण मुट्ठीभर मिट्टी प्राप्त करनेकी लालसासे भीख माँगता फिरे ॥८६॥ हाय ! ये लोग इसी प्रकार अपने आत्मानन्द को न जाननेके कारण भ्रमित हो रहे हैं और बड़ा भारी परिश्रम करनेपर लेशमात्र बाह्य सुख प्राप्त कर पाते हैं ॥ ८७ ॥ बस, अब मुझे इस बाह्य सुखलेशके लिये परिश्रम करनेकी कोई आवश्यकता नहीं हैं। मैं तो सर्वदा इस अनन्त-आनन्द समूहमें ही निमग्न रहा करूँगा ॥ ८८ ॥ अब इस बाह्य व्यवहारसे भी मुझे क्या लेना है। यह पिसे हुएको पीसनेके समान और निन्दाका स्थान ही तो है ॥ ८६ ॥ नित्य वे ही भोज्य पदार्थ हैं, वे ही मालाएँ और सेजें हैं तथा वे ही तरह-तरहके आभूषण और स्त्री-सम्भोगादि हैं ॥ ६० ॥ चिरकालसे सेवन करते-करते यद्यपि ये उच्छिष्ट जैसे हो गये हैं, फिर भी इन्हींको सेवन करते रहते हैं। भेड़चालकी तरह परम्परासे ऐसा ही होता रहा है, इसलिये इनमें घृणा भी नहीं होती ॥ ६१ ॥ ऐसा निश्चय करके मैं ज्यों ही पुनः अन्तर्मुख होने लगा कि