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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

सप्तदशोऽध्यायः। २५३ पराङ्कर्यशयनासीनो मदिरामदघूर्णितः ॥ ७९ ॥ अश्रौषं खे सिद्धगणवचनं मधुपेशलम् । अद्वैतत्वाश्रितं चैव तत्काले ह्यविदं पदम् ॥ ८० ॥ विज्ञातं तद्विचारेण ध्यानेनापि तदेव हि । एवमर्द्धमुहूर्त्तेन ज्ञात्वा तत्पावनं पदम् ॥ ८१ ॥ मुहूर्त्तमभवं भूयस्तत्समाहितमानसः । परमानन्दवाराशिपरिमग्नो ह्यशेषतः ॥ ८२ ॥ अथ स्मृतिं समासाद्य विचारपरमोऽभवम् । अहोऽद्भुतपदं ह्येतदानन्दामृतनिर्भरम् ॥ ८३ ॥ अपूर्वमासादितं मे भूयस्तत् संविशाम्यहम् । नैतस्य लेशमात्रं स्यादैन्द्रादिसुखमप्यलम् ॥ ८४ ॥ आब्रह्म सुखमेतस्य लेशतोऽपि न सम्मितम् । अद्यावधि व्यर्थ एष कालो मे व्यतिवाहितः ॥ ८५ ॥ सेजपर बैठा था। मेरी प्रियतमाने मुझे आलिंगित किया हुआ था और मेरे नेत्र मदिराके मदसे चंचल हो रहे थे। इसी समय मैंने आकाशमें सिद्धगणोंके मधुके समान मधुर शब्द सुने। वे अद्वैततत्त्वका निरूपण करनेवाले थे। बस, उसी समय मुझे उस परमपदका ज्ञान हो गया ॥ ७८ उ०-८० ॥ उसी समय विचार और ध्यानके द्वारा भी मैंने उसे जान लिया। इस प्रकार आधे मुहूर्त्तमें ही उस पवित्र पदको जानकर मैं एक मुहूर्त्ततक उसीमें समाहित रहा और पूर्णतया परमानन्द समुद्रमें निमग्न हो गया ॥ ८१-८२ ॥ फिर सावधान होनेपर मैं इस प्रकार विचार करने लगा—'अहो ! यह पद तो बड़ा ही विचित्र है। यह तो आनन्दामृतसे लबालब भरपूर है ॥ ८३ ॥ आज मुझे यह अभूतपूर्व स्थान मिला है। मैं पुनः उसीमें प्रवेश करता हूँ। इन्द्रादि महत्पदोंके सुख तो इसके लेशमात्र भी नहीं हैं ॥ ८४ ॥ ब्रह्मलोकतकका सुख इसके कणमात्रसे भी तुलना नहीं कर सकता। आज तक तो मैंने वृथा ही अपना समय नष्ट किया ॥ ८५ ॥

२५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अविदित्वा स्वं निधानं चिन्तामणिगणान्वितम् । यथा भिक्षामटति वै मुष्टिपिष्टप्रलिप्सया ॥ ८६ ॥ अहो लोकास्तथा स्वात्मानन्दाज्ञानविमोहिताः । बाह्यं सुखं लेशमात्रं प्राप्नुवन्ति महाश्रमैः ॥ ८७ ॥ तदलं मे वृथा बाह्यसुखलेशपरिश्रमात् । अनन्तानन्दसन्दोहतत्परः स्यां हि सर्वदा ॥ ८८ ॥ अलमेतेन बाह्येन व्यवहारेण मे किमु । पिष्टपेषणकल्पेन चोपालम्भपदेन वै ॥ ८९ ॥ तानि भोज्यानि तान्येव माल्यानि शयनानि च । भूषणानि विचित्राणि योषित्सम्भोगकाश्च ते ॥ ९० ॥ चिरपर्युषितप्रायाण्यपि संसेव्यतः पुनः । गतानुगतिकत्वान्मे जुगुप्सा न हि जायते ॥ ९१ ॥ इति निश्चित्य भूयोऽहं यावदन्तर्मुखोद्यतः ।

जैसे कोई चिन्तामणियोँसे भरे हुए अपने खजानेको न जाननेके कारण मुट्ठीभर मिट्टी प्राप्त करनेकी लालसासे भीख माँगता फिरे ॥८६॥ हाय ! ये लोग इसी प्रकार अपने आत्मानन्द को न जाननेके कारण भ्रमित हो रहे हैं और बड़ा भारी परिश्रम करनेपर लेशमात्र बाह्य सुख प्राप्त कर पाते हैं ॥ ८७ ॥ बस, अब मुझे इस बाह्य सुखलेशके लिये परिश्रम करनेकी कोई आवश्यकता नहीं हैं। मैं तो सर्वदा इस अनन्त-आनन्द समूहमें ही निमग्न रहा करूँगा ॥ ८८ ॥ अब इस बाह्य व्यवहारसे भी मुझे क्या लेना है। यह पिसे हुएको पीसनेके समान और निन्दाका स्थान ही तो है ॥ ८६ ॥ नित्य वे ही भोज्य पदार्थ हैं, वे ही मालाएँ और सेजें हैं तथा वे ही तरह-तरहके आभूषण और स्त्री-सम्भोगादि हैं ॥ ६० ॥ चिरकालसे सेवन करते-करते यद्यपि ये उच्छिष्ट जैसे हो गये हैं, फिर भी इन्हींको सेवन करते रहते हैं। भेड़चालकी तरह परम्परासे ऐसा ही होता रहा है, इसलिये इनमें घृणा भी नहीं होती ॥ ६१ ॥ ऐसा निश्चय करके मैं ज्यों ही पुनः अन्तर्मुख होने लगा कि

सप्तदशोऽध्यायः। २५५ तावदन्यो विमर्शो मां सुशुभः प्रत्युपस्थितः ॥ ९२ ॥ अहो मे चित्तमोहोऽयं किं मामेवमुपस्थितः । आनन्दपरिपूर्णात्मा स एवाहं स्थितोऽपि सन् ॥ ९३ ॥ भूयः किं कर्तुमिच्छामि प्राप्तव्यं वाऽपि किं मया । किमप्राप्तं मया कुत्र कदा वा प्राप्यते कथम् ॥ ९४ ॥ अप्राप्तस्यापि सम्प्राप्तिः कथं सत्या हि सम्भवेत् । अहोऽनन्तचिदानन्दरूपे मे स्यात् कथं क्रिया ॥ ९५ ॥ देहेन्द्रियान्तःकरणान्यपि स्वप्नसमानि वै । ममैव तानि सर्वाणि त्वखण्डैकचिदात्मनः ॥ ९६ ॥ तत्रैकमन्तःकरणं निरुध्यापि च किं भवेत् । अन्यान्यप्यनिरुद्धानि मनांसि च ममैव हि ॥ ९७ ॥ तथा चैकस्य मनसो निरोधे मम किं भवेत् । निरुद्धान्यनिरुद्धानि मनांसि मयि भान्त्यलम् ॥ ९८ ॥ निरोधे सर्वमनसामपि मे न निरोधनम् । उसी समय मेरे सामने एक दूसरा शुभ विचार उपस्थित हुआ ॥ ६२ ॥ [ मैं सोचने लगा-] 'अरे ! मुझे यह कैसा मनोमोह हो गया । जो आनन्दसे परिपूर्ण आत्मतत्त्व है वही तो मैं हूँ । फिर मैं क्या करना चाहता हूँ । मुझे अब और क्या पाना है ? ऐसी कौन वस्तु है जो मुझे प्राप्त नहीं है और वह मुझे कहाँ कब और कैसे मिलेगी ? । ६३-६४।। जो चीज प्राप्त है ही नहीं उसकी प्राप्ति क्या कभी सच हो सकती है ? मेरा स्वरूप तो अनन्त चिदानन्द है, मेरे द्वारा क्रिया कैसे हो सकती है ? ॥ ६५ ॥ देह, इन्द्रिय और अन्तःकरण भी स्वप्नके समान मिथ्या ही हैं । मैं अखण्ड चिदात्मा हूँ और ये सभी मेरे हैं ॥ ६६ ॥ फिर एक अन्तःकरणका निरोध करके भी क्या होगा । अन्य बिना निरोध किये मन भी तो मेरे ही रहेंगे ॥ ६७ ॥ इस प्रकार एक मनको रोकनेसे मुझे लाभ भी क्या ? मुझमें तो अनेकों रोके हुए और बिना रोके हुए मन भासते ही रहते हैं ॥६८॥ यदि सब मनोंका निरोध कर लिया जाय तब भी मेरा निरोध तो

२५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे महाकाशात् सुवितते कुतो मयि निरोधनम् ॥ ९९ ॥ एवं पूर्णानन्दरूपे समाधिः स्यात् कथं मयि । चिदानन्दप्रपूर्णस्य पूर्णस्य गगनादपि ॥ १०० ॥ मम क्रिया कथं का स्यादद्वयाऽपि शुभाशुभा । अनन्तेषु शरीरात्माभासेषु मन्महित्वतः ॥ १०१ ॥ क्रियाभासावभासेन तदभावेन वाऽपि किम् । कर्त्तव्यं वाप्यकर्त्तव्यं मम नास्त्यपि लेशतः ॥ १०२ ॥ तस्मान्निरोधने किं स्यादहमानन्दनिर्भरः । समाधावसमाधौ वा सत्यपूर्णस्वभावकः ॥ १०३ ॥ यस्यां क्रियायां देहोऽयं स्थितस्तत्रैव तिष्ठतु । इत्यहं सर्वथा स्वस्थः सुमहामन्दमन्दिरः ॥ १०४ ॥ अनस्तमितभारूपोऽहं सुपूर्णो निरञ्जनः । उत्तमाधिकृतस्यैवं स्थितिर्मे सम्प्रकीर्तिता ॥ १०५ ॥ होगा नहीं। मैं तो व्यापक महाकाश हूँ, मेरा निरोध कैसे होगा ? ॥९६॥ इस प्रकार पूर्णानन्दस्वरूप मेरी समाधि होगी ही कैसे ? तथा मैं तो चिदानन्दसे परिपूर्ण और आकाशसे भी अधिक व्यापक हूँ! फिर मेरे द्वारा कोई शुभ या अशुभ अद्वितीय क्रिया भी कैसे हो सकेगी ? ॥ १००--१०१ पू० ॥ अनन्त शरीर और आत्माभास मेरी महिमासे भास रहे हैं। फिर किसी क्रियाभासके भासने अथवा न भासनेसे मुझे क्या प्रयोजन है ? इसलिये मेरा लेशमात्र भी न कोई कर्त्तव्य है न अकर्त्तव्य ॥ १०१ उ०-१०२ ॥ मैं तो आनन्दसे परिपूर्ण हूँ, अतः निरोध करनेसे ही मुझे क्या मिलेगा ? मेरी समाधि हो अथवा न हो मैं तो सत्य और पूर्णस्वरूप ही हूँ ॥ १०३ ॥ मेरा यह शरीर जिस क्रियामें स्थित हो उसीमें स्थित रहे। ऐसा विचारकर मैं तो सर्वदा अपने स्वरूपमें ही स्थित और परमानन्दसे परिपूर्ण रहता हूँ। मैं अलुप्तप्रकाशस्वरूप, परिपूर्ण और निर्मल हूँ ॥ १०४-१०५ पू० ॥ इस प्रकार मैंने उत्तमाधिकारी अपनी ही स्थितिका वर्णन किया।

सप्तदशोऽध्यायः । २५७ अधमानामनेकैस्तु जन्मभिर्ज्ञानजं फलम् । मध्यमानान्तु क्रमशः श्रवणं च विचारणम् ॥ १०६ ॥ अनुध्यानं च भवति ततो ज्ञानं प्रजायते । विज्ञानफलसंयुक्तसमाधिर्दुर्लभो भवेत् ॥ १०७ ॥ विज्ञानफलहीनेन किं समाधिशतेन वा । तस्माद्विज्ञानहीनैस्तैः फलं नास्ति समाधिभिः ॥ १०८ ॥ लोकेऽपि गच्छन् मार्गेषु निर्विकल्पप्रकाशितान् । भावानविज्ञाय तेषामज्ञानं न निवर्त्तते ॥ १०९ ॥ निर्विकल्पाख्यविज्ञानं ज्ञानमात्रं निजं वपुः । तत् सर्वदा भासमानमप्यभातविधं ननु ॥ ११० ॥ विकल्पाच्छादनादेव विकल्पानां व्यपोहने । भासमानमेव भूयो भातकल्पमपूर्वतः ॥ १११ ॥ अधम अधिकारियोंको ज्ञानका फल अनेक जन्मोंके पश्चात् मिलता है । तथा मध्यम अधिकारियोंको क्रमशः श्रवण, मनन और निदिध्यासन करने होते हैं; तब ज्ञान होता है ॥ १०५ उ०-१०७ पू० ॥ जिसका फल विज्ञान है ऐसी समाधि साधारणतया दुर्लभ ही है। और जिनसे विज्ञानरूप फल प्राप्त न हो ऐसी सैकड़ों समाधियाँ होती रहें तो भी क्या लाभ ? इसीसे [ व्यवहार-दशा- में होनेवाली ] उन विज्ञानहीन समाधियोंसे मोक्षरूप फलकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १०७ उ०-१०८ ॥ लोकमें भी देखा जाता है कि मार्गमें चलते समय निर्विकल्प१ मनसे अनेकों वस्तुएँ देखी जाती हैं। परन्तु उन्हें न जाननेके कारण उनके अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती ॥ १०९ ॥ निर्विकल्प ज्ञान तो विशुद्ध ज्ञानमात्र है और वह अपना स्वरूप ही है। वह सर्वदा भासते रहनेपर भी विकल्पोंसे ढका रहने के कारण ही भासित-सा नहीं होता। उन विकल्पों (विशेष कल्पनाओं) की निवृत्ति होनेपर, वह पहलेहीसे भासमान रहते हुए भी, नया-सा भासित होता है ॥ ११०-१११ ॥ १. उन वस्तुओंके सम्बन्धमें जिसकी कोई कल्पना नहीं है ऐसे मनसे ।

२५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ज्ञानज्ञेयाविभेदेन त्वज्ञातं ज्ञातमुच्यते । एवमेष भवेदात्मविज्ञानक्रम उत्तमः ॥ ११२ ॥ ब्रह्मन्नेवं श्रुतं भूयो विचार्य ज्ञातुमर्हसि । अथ विज्ञायात्मतत्त्वं कृतार्थस्त्वं भविष्यसि ॥ ११३ ॥ जनकेनैवमादिष्टस्त्वष्टावक्रो महामुनिः । पूजितस्त्वभ्यनुज्ञातो गत्वा स्वस्थानमादरात् ॥ ११४ ॥ विचारानुध्यानपूर्वं विज्ञाय परमं पदम् । विधूय सर्वसन्देहान् जीवन्मुक्तो भवेद् द्रुतम् ॥ ११५ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावकीये सप्तदशोऽध्यायः । विशुद्ध ज्ञान और उससे भासित होनेवाले ज्ञेय पदार्थका भेद न जाननेके कारण जो आत्मतत्त्व पहले अज्ञात था [उनका भेद ज्ञात होने- पर] अब वही ज्ञात कहा जाता है । इस प्रकार यही आत्मज्ञानका उत्तम क्रम है ॥ ११२ ॥ ब्रह्मन् ! आपने जो यह आत्मज्ञानका क्रम सुना है इसपर बार-बार विचार करनेसे आपको भी ज्ञान हो सकता है । फिर ज्ञान प्राप्त करके आप कृतकृत्य हो जायेंगे" ॥ ११३ ॥ इस प्रकार ·अष्टावक्र मुनिने जनकसे उपदेश प्राप्त किया, फिर जनकने पूजा करके उन्हें विदा किया । तदनन्तर अपने स्थानपर उन्होंने आदरपूर्वक मनन और निदिध्यासन करके उस परम पदको जान लिया । उनके सभी संशय निवृत्त हो गये और उन्हें तत्काल जीवन्मुक्तपदकी प्राप्ति हो गयी ॥ ११४-११५ ॥ सप्तदश अध्याय समाप्त ।

अष्टादशोऽध्यायः भार्गवैवं हि सा संविद्वेद्यवन्ध्या निरूपिता । उपलब्धिदशा तस्या बहुधा संश्रुता ननु ॥ १ ॥ अव्युत्पत्त्या न जानन्ति जना मायाविमोहिताः । सा दशा भाव्यते सूक्ष्मदृशैव नान्यथा क्वचित् ॥ २ ॥ किं बहूक्तेन ते राम शृणु सारं ब्रवीम्यहम् । मनसा वेद्यते वेद्यं मनसोऽतो न वेद्यता ॥ ३ ॥ तथा च वेद्यनिर्मुक्तं मनोऽप्यस्तीति सम्भवेत् । तन्मनो वेद्यनिर्मुक्तवित्तिरित्यभिधीयते ॥ ४ ॥ उपलब्धिस्वरूपत्वाद्विदितैव हि सा सदा । अन्योपलब्ध्यपेक्षायामन्ध्यं स्यादनवस्थितेः ॥ ५ ॥ अष्टादश अध्याय ॥ १८ ॥ जनक और अष्टावक्रके संवादका शेषभाग [ श्रीदत्तात्रेयजीने कहा—] परशुराम ! इस प्रकार मैंने उस वेद्य- वस्तुविहीन शुद्ध संवित्का निरूपण किया और तुमने व्यवहारमें उसकी उपलब्धिकी अनेकों अवस्थाओंके विषयमें भी सुना ॥ १ ॥ किन्तु मायामोहित पुरुषोंको समझ न होनेके कारण उसकी पहचान नहीं होती। उस स्थितिका ज्ञान तो [ अन्तर्मुख मनसे ] केवल सूक्ष्मदर्शियोंको ही होता है, अन्य किसी प्रकार नहीं ॥ २ ॥ परशुराम ! अधिक कहनेसे क्या लाभ ? सुनो, मैं सार बात बतलाता हूँ। मनसे तो दृश्य पदार्थ जाने जाते हैं, इसलिये मन दृश्य नहीं है ॥ ३ ॥ परन्तु दृश्य न रहनेपर भी मन रहता है—यह भी निश्चय है। बस, वह वेद्यविहीन मन ही ‘शुद्ध संवित्’ कहा जाता है ॥ ४ ॥ वह ज्ञानस्वरूप है, इसलिये सर्वदा प्रकाशमान ही है। यदि उसकी उपलब्धिके लिये किसी अन्यकी अपेक्षा मानी जाय तो [ उस अन्यके लिये उससे भिन्नकी और उसके लिये उससे भिन्नकी अपेक्षा होगी ] इस प्रकार अनवस्था दोष उपस्थित होगा और फिर [ कोई स्वयंप्रकाश तत्त्व न रहनेके कारण ] सर्वत्र अन्धकार ही शेष रहेगा [ अर्थात् किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं हो सकेगा ] ॥ ५ ॥

२६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे किञ्चिद्भावं हि संपश्यन्न भासि किमु भार्गव । न भासि चेन्न त्वमसि ततः प्रश्नस्तु ते कथम् ॥ ६ ॥ अहो स्वयं खपुष्पात्मा सन् कथं हि तमिच्छसि । कथं त्वात्मानमहं साधयामि विभावय ॥ ७ ॥ सामान्येन विभान्तं मां न जानामि विशेषतः । इति चेद्राम सामान्यमेव ते रूपमव्ययम् ॥ ८ ॥ विशेषलेशरहितमेतावद्ध्येव ते वपुः । अहो जानन्नपि पुनरलं मुह्यसि वै वृथा ॥ ९ ॥ भासकं सर्वमपि च विशेषविषयं भवेत् । अतः सामान्यरूपस्त्वं विभासि स्वत एव हि ॥ १० ॥ शरीराद्यात्मना भासि चेच्छृणु प्रब्रवीमि ते । भृगुनन्दन ! किसी भी पदार्थको देखते समय क्या तुम्हें अपना भान नहीं होता ? यदि नहीं होता तो तुम हो ही नहीं, फिर प्रश्न किस प्रकार करते हो ? ॥ ६ ॥ अजी ! यदि तुम आकाशकुसुमके समान अलीक हो, तो फिर तुम अपनेको जानना क्यों चाहते हो ? सोचो तो, फिर मैं तुम्हारे स्वरूपको सिद्ध ही कैसे कर सकता हूँ ? ॥ ७ ॥ यदि कहो कि मैं सामान्यरूपसे तो भासता हूँ परन्तु विशेषरूपसे अपनेको नहीं जानता, तो यह सामान्य ही तो तुम्हारा अविनाशी स्वरूप है ॥ ८ ॥ जिसमें किसी प्रकारके विशेषका लेश भी नहीं है वही तुम्हारा स्वरूप है । आश्चर्य है, कि इसप्रकार अपनेको जानते हुए भी तुम व्यर्थ ही भ्रममें पड़े हुए हो ॥ ६ ॥ सबको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान भी विशेषविषयक होता है ।¹ अतः तुम तो केवल सामान्यरूप हो और स्वयं ही प्रकाशमान हो ॥१०॥ यदि कहो कि मैं शरीरादिरूपसे भासता हूँ, तो सुनो मैं बतलाता १. घट-पट आदि विषयोंको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान उन अपने भास्य विषयोंके द्वारा निरूपित होता है, इसलिये घटज्ञान-पटज्ञान आदि रूपसे वह विशेष- विषयक कहा जाता है । स्वरूपभूत शुद्ध ज्ञान तो विषयविवर्जित है । अतः वह ज्ञानसामान्य है और ज्ञानमात्र होनेके कारण स्वयंप्रकाश ही है ।

अष्टादशोऽध्यायः। २६१ शरीरात्मतया भासि सङ्कल्पेनैव नान्यथा ॥ ११ ॥ विभावय सूक्ष्मदृशा सङ्कल्पेऽन्यस्य देहतः। भाति किं तव देहत्वं देहस्तच्चापि ते भवेत् ॥ १२ ॥ एवं सङ्कल्प्यते यद्यच्छरीरं तत्तदेव हि। तेन सर्वमयस्त्वं स्याः कथं देहात्ममात्रकः ॥ १३ ॥ तस्माद् दृश्यं तव वपुर्न हि स्याद्व्यभिचारतः। तस्माद् दृङ्मात्ररूपोऽसि न दृग् दृश्या कदाचन ॥ १४ ॥ सा स्वप्रभा दृश्यरूपविशेषलेशवर्जिता । देहदेशकालभेदचित्रवैचित्र्यचित्रिता ॥ १५ ॥ तस्मात् सङ्कल्पमात्रस्य वर्जनात् परतः स्थितम्। शेषं शुद्धचिते रूपं स्वात्मानमुपलक्षय ॥ १६ ॥ हूँ। शरीरादि रूपसे तो तुम शरीरादिका संकल्प होनेपर ही भासते हो, स्वतः नहीं ॥ ११॥ सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो, जब तुम्हें देहसे भिन्न किसी अन्य वस्तुका संकल्प होता है तब क्या तुम्हें अपनी देहरूपता भासती है ? [यदि शरीरके साथ सम्बन्ध भासनेके कारण ही तुम शरीरको अपना स्वरूप मानते हो] तब तो सम्बन्ध होनेके कारण वे अन्य पदार्थ भी तुम्हारे शरीर सिद्ध होंगे ॥ १२ ॥ इस प्रकार तो तुम्हारे द्वारा जिस-जिसका संकल्प होगा वही तुम्हारा शरीर सिद्ध होगा। इस तरह तो तुम सर्वस्वरूप हो जाओगे, फिर केवल एक शरीरमात्र कैसे रहोगे ? ॥ १३ ॥ अतः कोई भी दृश्य तुम्हारा स्वरूप नहीं हो सकता, क्योंकि वह परिवर्तनशील होगा। इसलिये तुम ज्ञानमात्र हो ज्ञानके विषय कभी नहीं ॥ १४ ॥ वह स्वरूपभूत ज्ञान स्वयंप्रकाश है, उसमें ज्ञेयरूप विशेषका लेश भी नहीं है तथा [सबका आश्रय होनेके कारण] वह देह, देश और कालभेद रूप चित्रकी विचित्रतासे अंकित है ॥ १५ ॥ अतः संकल्पमात्रके त्यागने पर जो सबसे अतीत शुद्ध चेतनका स्वरूप शेष रह जाता है उसीको तुम अपना आत्मा जानो ॥ १६ ॥

२६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं सकृल्लक्षिते तु यत् स्थितं तदलक्षणात् । अज्ञानं सर्वसंसारकारणं तद्विलीयते ॥ १७ ॥ न मोक्षो नभसः पृष्ठे न पाताले न भूतले । सङ्कल्पवर्जनाच्छुद्धस्वरूपस्य प्रथैव सः ॥ १८ ॥ स स्वरूपात्मकत्वात्तु नाऽप्राप्तः स्यात् कदाचन । केवलं मोहमात्रस्य निरासेन कृतार्थता ॥ १९ ॥ अन्यो मोक्षो न सम्भाव्यः कृतकत्वाद्विनाश्यते । स्वरूपादतिरिक्तश्चेच्छशशृङ्गसमो हि सः ॥ २० ॥ स्वरूपं सर्वतः पूर्णमन्यो मोक्षः क्व सम्भवेत् । स्वरूपे सम्भवन् मोक्षो दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ २१ ॥ लोकेऽपि बन्धविगमादृते मोक्षो न भावितः । विगमोऽभाव एव स्यात् सत्यो भावात्मकः कथम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार जब एक बार उसे लख लिया जाता है तो उसमें जो देहादि भासते हैं उनपर दृष्टि न रहनेके कारण सम्पूर्ण संसारका कारण जो अज्ञान है वह लीन हो जाता है ॥ १७ ॥ मोक्ष न आकाशकें ऊपर है, न पाताल या भूतलमें है। बस, संकल्पत्यागके द्वारा जो शुद्धस्वरूपमें स्थिति है वही 'मोक्ष' है ॥ १८ ॥ वह स्वरूपभूत ही है, इसलिये कभी अप्राप्त भी नहीं है। केवल मोहमात्रका त्याग होनेपर ही कृतकृत्यता हो जाती है ॥ १६ ॥ इसके सिवा कोई और मोक्ष होना सम्भव नहीं है, क्योंकि वह कृतक ( क्रियासाध्य ) होनेके कारण नष्ट हो जायगा । और यदि वह स्वरूपसे भिन्न हुआ तो खरगोशके सींगोंके समान अलीक ही होगा ॥ २० ॥ अपना स्वरूप तो सभी ओर परिपूर्ण है, फिर उससे भिन्न कोई अन्य मोक्ष कहाँ हो सकता है ? यदि उसे स्वरूपमें ही माना जाय तब तो वह दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान उससे अभिन्न ही होगा ॥२१॥ लोकमें भी बन्धनकी निवृत्तिके सिवा मोक्ष और कुछ नहीं माना गया । और 'निवृत्ति' अभावरूप ही होती है, अतः अभावात्मक बन्ध- निवृत्ति सत्य ( भावरूप ) कैसे हो सकती है ? ॥ २२ ॥

अष्टादशोऽध्यायः । २६३ भावाभावात्मकं वस्तु न हि सम्भवति क्वचित् । तथा च स्वाप्नभावाश्च भावाभावोभयात्मकाः ॥ २३ ॥ सत्याः स्युर्बाधहेतोस्ते त्वसत्या इति चेच्छृणु । बाधोऽभावप्रत्ययः स्यात् प्रत्ययाभावकालिकः ॥ २४ ॥ यस्यैवं बाधयोगः स्यात् सोऽसत्यो न हि चेतरः । अस्ति सर्वस्य दृश्यस्य बाधोऽप्रत्ययकालिकः ॥ २५ ॥ तस्मादसत्यमेव स्यात् भावाभावात्मना स्थितम् । यस्याभावस्पर्शलेशः कदाचित् कुत्रचिन्नहि ॥ २६ ॥ एवंविधन्तु चित्तत्त्वं सत्यं सर्वात्मना स्थितम् । तस्माद्विभिन्नमोक्षस्तु न सत्यः स्यात् कथञ्चन ॥ २७ ॥ मोक्षः पूर्णस्वरूपस्य सकृत् प्रथनमुच्यते । चेत्यवर्जनमात्रेण चितिः पूर्णा प्रकीर्त्तिता ॥ २८ ॥ चेत्याभासनमेवास्याश्चितेः सङ्कोचनं भवेत् । किसी भी वस्तुका भावाभावात्मक (सत्य और असत्य उभयरूप) होना तो कभी सम्भव ही नहीं है। यदि कहो कि स्वप्नके पदार्थ तो भावाभाव उभयरूप ही हैं, क्योंकि उपलब्ध होनेके कारण वे सत्य हैं और जाग्रत्कालमें बाधित हो जानेके कारण असत्य भी हैं, तो सुनो—॥ २३-२४ पू० ॥ पदार्थकी प्रतीति न होनेके समय जो उसकी अभावात्मिका प्रतीति होती है उसका नाम बाध है। जिसका इस प्रकार बाधसे सम्बन्ध रहता है वह पदार्थ असत्य होता है, अन्य नहीं ॥ २४ उ०-२५ पू० ॥ यह अप्रतीतिकालिक बाध सभी दृश्यवर्गका होता है, अतः भावा- भावात्मक रूपसे स्थित सारा दृश्य असत्य ही है ॥ २५ उ०-२६ पू० ॥ किन्तु जिसे कभी किसी अवस्था में अभावका लेशमात्र भी स्पर्श नहीं होता ऐसा चेतनतत्त्व तो सब प्रकार सत्य ही है। उससे भिन्न जो मोक्ष होगा वह किसी प्रकार सत्य नहीं हो सकता ॥ २६ उ०-२७ ॥ उस पूर्णस्वरूपका निरन्तर स्फुरण ही मोक्ष कहा जाता है। चेत्य पदार्थोंके त्यागमात्रसे चेतन पूर्ण कहा जाता है ॥ २८ ॥ चेत्य पदार्थोंका भासना ही चेतनका संकुचित होना है। जब

२६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे चेत्याभाने चितिः पूर्णा परिच्छेदविवर्जनात् ॥ २९ ॥ कालादिभिः परिच्छेदो यदि तस्या निरूप्यते । अचेतितः परिच्छेदश्चेतितो वा भवेद्वद ॥ ३० ॥ अचेतने ह्यसिद्धः स्याच्चेतने सैव व्यापिका । लोके कालपरिच्छिन्नो भावो यः कोऽपि भावितः ॥ ३१ ॥ भावकालौ परिच्छेद्यपरिच्छेदकतां गतौ । चिता व्याप्तौ भवेतां वै यदा तर्हि तथाविधौ ॥ ३२ ॥ अन्याप्तौ तु चिता यहिं कथं सिद्ध्येत् परिच्छिदिः । चितेर्बहिर्यदा चेत्यमस्ति तत् स्यात् परिच्छिदिः ॥ ३३ ॥ चितेर्बहिहिश्चेत्यसिद्धिः सर्वथा नोपपद्यते । चेत्यका भान न रहे तो परिच्छेद न रहनेके कारण चेतन परिपूर्ण ही है ॥ २९ ॥ यदि कोई कहे कि कालादिके द्वारा उसका परिच्छेद हो सकता है, तो बताओ कि वह परिच्छेद चेतनसे अप्रकाशित होगा अथवा प्रकाशित ? ॥ ३० ॥ यदि वह चेतनसे अप्रकाशित होगा तब तो उसकी सिद्धि ही नहीं हो सकती और यदि प्रकाशित होगा तो वह व्यापक चेतन ही होगा। लोकमें जो भी पदार्थ कालपरिच्छिन्न माना जाता है उसमें उस पदार्थ और कालका परिच्छेद्य-परिच्छेदकरूप सम्बन्ध रहता है। किन्तु वे पदार्थ और काल दोनों ही चेतनसे व्याप्त रहते हैं तभी वे उस रूपमें भासते हैं ॥ ३१-३२ ॥ यदि वे चेतनसे व्याप्त न हों तो उनका परिच्छेद भी कैसे सिद्ध होगा¹। [ तथापि चेतन तो व्यापक और अद्वितीय है, ] क्योंकि उसका परिच्छेद तो तभी हो सकता है यदि उससे बाहर कोई चेत्य पदार्थ हो ॥ ३३ ॥ किन्तु चेतनसे बाहर तो चेत्यकी सत्ता किसी प्रकार सिद्ध नहीं १. 'चेतनसे व्याप्त न होने' का अर्थ है चेतनसे प्रकाशित न होना । जो वस्तु, भाव या सम्बन्ध चेतनसे प्रकाशित न हो उसका भान किसे होगा और किसीको भी भान न होनेपर उसकी सत्ता कैसे सिद्ध होगी ?

अष्टादशोऽध्यायः। २६५ यो बहिः स कथं सिद्धयेच्चितिसम्बन्धवर्जितः ॥ ३४ ॥ सम्बन्धोऽपि नैकदेशः स्यादसिद्धस्तथेतरः । तत्सम्बन्धांशमात्रस्य भानादन्यन्न सिद्ध्यति ॥ ३५ ॥ अतो बहिः पदार्थोऽपि चितिनिर्मग्न इष्यताम् । एवं च सर्वात्मनैव मग्नं चेत्यमपीष्यताम् ॥ ३६ ॥ कथं स्वान्तर्विनिर्मग्नं स्वपरिच्छेदकं भवेत् । चेत्यमेवंविधं राम विचारय सुयुक्तिः ॥ ३७ ॥ चितेरन्तर्भासमानं प्रतिबिम्बात्मकं भवेत् । न भावोदरगोऽभावो भवन् लोके सुदृश्यते ॥ ३८ ॥ भावानां स्याद्धि साङ्कर्यं तथा चेद्राम सर्वतः । बहिः पदार्थस्ते प्रोक्तो भ्रममूलो हि सर्वथा ॥ ३९ ॥ तदाश्रयाणां भावानां कथं स्यात् सत्यता वद । चितिस्वरूपः स्वात्मैव तत्तद्भावात्मना सदा ॥ ४० ॥ हो सकती; क्योंकि चेतनसे सम्बन्ध न रखकर जो पदार्थ उससे बाहर होगा उसकी सिद्धि कैसे होगी ? ॥ ३४ ॥ वह चेत्य और चेतनका सम्बन्ध भी एक देशमें नहीं माना जा सकता । यदि ऐसा माना जाय तो चेत्यके अन्य अंशकी सिद्धि नहीं हो सकती । उस सम्बन्धित अंशमात्रका भान होनेसे ही अन्य अंश तो सिद्ध नहीं हो जाता ॥ ३५ ॥ अतः बाह्य पदार्थोंको भी चेतनमें डूबे हुए समझो । इस प्रकार चेत्यवर्गको भी सर्वथा चेतनके गर्भमें ही अनुभव करो ॥ ३६ ॥ जो चेत्य अपनेमें ही निमग्न है वह अपना ही परिच्छेदक कैसे हो सकता है ? हे परशुराम ! इस प्रकार युक्तिपूर्वक विचार करो ॥३७॥ जो वस्तु चेतनके भीतर भासती है वह प्रतिबिम्बरूप ही हो सकती है, क्योंकि लोकमें किसी एक पदार्थके भीतर रहनेवाला दूसरा पदार्थ देखा नहीं जाता ॥ ३८ ॥ परशुराम ! यदि ऐसा माना जायगा तब तो सर्वत्र पदार्थोंका घोटाला हो जायगा । यह बात पहले कही ही जा चुकी है कि बाह्य पदार्थ सर्वथा भ्रममूलक हैं । तो बताओ, उस बाह्याभासके आश्रित रहनेवाली वस्तुओंकी सत्यता कैसे सिद्ध हो सकती है ? ॥३६-४० पू०॥

२६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भासते स्वाच्छन्द्यशक्त्या नाधिकं विद्यते क्वचित् । इति वाक्यं समाकर्ण्य पुनः पप्रच्छ भार्गवः ॥ ४१ ॥ भगवन् भवता प्रोक्तं दुर्घटं प्रतिभाति मे । शुद्धा चितिर्विचित्रैका भासते इत्यसम्भवात् ॥ ४२ ॥ चितिश्चेत्यमिति द्वेधा वस्तु सर्वैर्विभावितम् । तत्र चेत्यं चिता भास्यं स्वप्रभा चितिरस्तु वै ॥ ४३ ॥ यथा लोकभातमपि वस्तु तद्भिन्नमस्ति वै । एवं चिता भासितं तु चेत्यमस्तु पृथग्विधम् ॥ ४४ ॥ चेत्यं चिदात्मकमिति नानुभूतिं समारुहेत् । अथ च प्रागभिहितं जनकेन महात्मना ॥ ४५ ॥ सङ्कल्पवर्जनादेव निर्विकल्पं मनो भवेत् । तदेव निर्विकल्पं स्याज्ज्ञानं संसारनाशनम् ॥ ४६ ॥ अतः चेतनस्वरूप अपना आत्मा ही अपनी स्वातन्त्र्यशक्तिके द्वारा उस-उस वस्तुके रूपमें सदा भास रहा है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है ॥ ४० उ०-४१ पू० ॥ दत्तात्रेयजीका यह उपदेश सुनकर परशुरामजीने फिर पूछा— “भगवन् ! आप जो कुछ बता रहे हैं वह तो मुझे असम्भव-सी बात जान पड़ती है। एक शुद्ध चेतन ही अनेक रूपमें भास रहा है—ऐसा तो हो नहीं सकता ॥ ४१ उ०-४२ ॥ चेतन और चेत्य—ये तो सभीने दो तत्त्व माने हैं। इनमें चेत्य चेतनसे भासित होता है, अतः चेतनका स्वयंप्रकाश होना तो ठीक है ॥ ४३ ॥ लोकमें जिस प्रकार भासित होनेवाली वस्तु भासकसे भिन्न होती है वैसे ही चेतनसे भासित चेत्यका उससे पृथक् होना भी उचित ही है। किन्तु चेत्य चेतनस्वरूप है—यह बात तो अनुभवमें नहीं आती ॥ ४४-४५ पू० ॥ इसके सिवा महात्मा जनकने जो पहले कहा कि संकल्प त्याग देनेसे ही मन निर्विकल्प हो जाता है। यही संसारकी निवृत्ति करनेवाला निर्विकल्प ज्ञान है और यही आत्माका भी स्वरूप है—

अष्टादशोऽध्यायः । २६७ तदेव ह्यात्मनो रूपमित्युक्तं तत् कथं भवेत् । आत्मनो हि मनः प्रोक्तं करणं ज्ञानकर्मणि ॥ ४७ ॥ मनो यद्यात्मनो न स्याद्विशिष्येत जडात् कथम् । मनो जडाद्विशेषः स्यादात्मनो भगवन्ननु ॥ ४८ ॥ मनसैव हि बन्धः स्यान्मोक्षो वाऽप्यात्मनः स्फुटम् । सविकल्पं मनो बन्धो मोक्षः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥ ४९ ॥ तत् कथं मन एवात्मा करणं हि मनः स्मृतम् । निर्विकल्पस्य संसिद्धावपि द्वैतं तु शिष्यते ॥ ५० ॥ अथापि लोके दृष्टोऽस्ति यस्य भ्रान्तिरसन् हि सः । न हि भ्रान्तिरसत्या स्यात्तदद्वैतं कथं भवेत् ॥ ५१ ॥ अर्थक्रिया न क्वचिच्च दृष्टा सत्येन वस्तुना । सो ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि ज्ञानरूप क्रियामें मन तो आत्माका करण कहा गया है ॥ ४५ उ०-४७ ॥ यदि आत्माके पास मन न हो तो जडवर्गसे उसका अन्तर कैसे होगा ? भगवन् ! आत्माका जो जडवर्गसे भेद है उसका कारण मन ही तो है ॥ ४८ ॥ तथा यह भी स्पष्ट है कि मनके कारण ही आत्माके बन्धन और मोक्ष होते हैं। सविकल्प मन ही आत्माका बन्धन है और निर्विकल्प ही उसका मोक्ष है ॥ ४९ ॥ ऐसी अवस्था में मन ही आत्मा कैसे हो सकता है ? मन तो उसका करण ही माना गया है। अतः निर्विकल्प मन मोक्षमें कारण हो भी तो भी [ आत्मा और मन-यह ] द्वैत तो रहता ही है ॥ ५० ॥ लोकमें यह भी देखा गया है कि जिस वस्तुकी भ्रान्ति होती है वही असत्य होती है। स्वयं भ्रान्ति तो असत्य नहीं होती¹। ऐसी अवस्थामें द्वैतका अभाव कैसे हो सकता है ॥ ५१ ॥ जो वस्तु असत्य होती है उसके द्वारा कभी व्यवहार होता भी १. तात्पर्य यह कि जैसे रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति होती है तो उसमें सर्प ही असत्य होता है, भ्रान्ति होने की घटना तो असत्य नहीं होती। अतः द्वैतका सर्वथा अभाव तो नहीं हुआ।

२६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वं हि जागतं वस्तु स्थिरमर्थक्रियाकरम् ॥ ५२ ॥ तदसत्यं कथं ब्रूहि यतोऽद्वैतं प्रसिद्ध्यति । सर्वं च भ्रान्तिविज्ञानं भ्रान्त्यभ्रान्तिभिदा कथम् ॥ ५३ ॥ भ्रान्तिः सर्वसमा वापि कथं स्याद् ब्रूहि मे गुरो । सन्देह एष विरतो हृदि मे परिवर्त्तते ॥ ५४ ॥ इत्येवं प्रश्नमाकर्ण्य दत्तात्रेयः समस्तवित् । साधुप्रश्नप्रहृष्टात्मा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५५ ॥ राम साधु त्वया पृष्टं प्रोक्तप्रायमिदं पुनः । यावन्न मनसस्तोषस्तावद् भूयो विशोधयेत् ॥ ५६ ॥ गुरुर्वापि कथं ब्रूयादपृष्टस्तन्मनोगतम् । प्राणिनां हि बुद्धिभेदात्तर्कः पृथगवस्थितः ॥ ५७ ॥ अपृष्ट्वा स्वस्वाऽभिमतं कः सन्देहाद्विमुच्यते । नहीं देखा गया । किन्तु संसारके सब पदार्थ तो स्थिर हैं और उनके द्वारा व्यवहार भी चल रहा है ॥ ५२ ॥ बताइये, वे असत्य कैसे हो सकते हैं, जिससे कि अद्वैतकी सिद्धि हो । यदि सारा ज्ञान भ्रान्तिरूप है तो इसमें भ्रान्ति और अभ्रा- न्तिका भेद भी कैसे होगा ? ॥ ५३ ॥ साथ ही, गुरुदेव ! यह भी बताइये कि यह भ्रान्ति सबको समान रूपसे क्यों भासती है ? मेरे हृदयमें यह बड़ा भारी सन्देह चक्कर काट रहा है” ॥ ५४ ॥ ऐसा प्रश्न सुनकर सर्वज्ञ दत्तात्रेयजीको इस सुन्दर प्रश्नके कारण बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहना आरम्भ किया—॥ ५५ ॥ “परशुराम ! तुमने सुन्दर प्रश्न किया । ये बातें प्रायः कही जा चुकी हैं । तथापि जबतक अपने मनको सन्तोष न हो तबतक बार- बार इनपर विचार करना ही चाहिये ॥ ५६ ॥ यदि पूछा न जाय तो गुरु भी शिष्यके मनमें छिपे सन्देहके विषयमें किस प्रकार कह सकते हैं । प्राणियोंकी बुद्धियाँ अनेक प्रकार की हैं, अतः उनके समाधानके लिये युक्तियाँ भी अलग- अलग हैं ॥ ५७ ॥ अतः अपने-अपने आशयके विषयमें प्रश्न किये बिना भला कौन

अष्टादशोऽध्यायः। २६६ प्रष्टुर्विद्या हि सुदृढा प्रश्नो बीजं निरूपणे ॥ ५८ ॥ अप्रष्टुर्नैव विद्या स्यात् पृष्ट्वा विद्यात्ततो गुरुम् । चितिरेकैव वैचित्र्याद्भासते इति सम्भवेत् ॥ ५९ ॥ एकरूपो यथाऽऽदर्शः प्रतिबिम्बादनेकधा । पश्य स्वाप्नविकल्पादौ मन एकं हि केवलम् ॥ ६० ॥ द्रष्टृदर्शनदृश्यात्मवैचित्र्येण विभाति हि । एवं शुद्धैव सा संविद्विचित्राकारभासिनी ॥ ६१ ॥ चितिश्चेत्यमिति द्वेधा स्वप्नेऽपि हि विभासते । आलोकमन्तरा त्वन्धो भावं जानाति वै ननु ॥ ६२ ॥ अन्धस्याभासमानश्च रूपं भाति स्मृतौ किल । नैवं चितेरभाने किं कदा कुत्र विभासते ॥ ६३ ॥ सन्देहसे छूट सकता है ? विद्या तो पूछनेवालेकी ही पक्की होती है, वास्तवमें प्रश्न ही निरूपणका बीज है। जो प्रश्न नहीं करता उसे विद्या (ज्ञान) प्राप्त नहीं होती, अतः प्रश्न करके ही गुरुदेवसे विद्या प्राप्त करनी चाहिये ॥ ५८-५९ पू० ॥ एक ही चैतन्य अनेकरूपोंमें भास रहा है—यह बात इसी प्रकार सम्भव है जैसे दर्पण एकरूप होनेपर भी प्रतिबिम्बके कारण अनेकरूप जान पड़ता है ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ देखो, स्वप्न और मनोराज्य आदिमें केवल एक ही मन द्रष्टा; दर्शन और दृश्य आदि अनेक रूपोंमें भासता ही है। इसी प्रकार वह संवित् शुद्ध होनेपर भी अनेक रूपोंमें भासनेवाली है। स्वप्नमें भी चिति और चेत्य-ये दो भेद भासते ही हैं। [यदि यह द्वैत स्वप्नमें मिथ्या है तो जाग्रत्में क्यों नहीं है ? ] ॥ ६० उ०-६२ पू० ॥ [तुमने कहा कि प्रकाश और घटादिके समान भासक और भास्य दोनोंहीकी सत्ता है, सो यह बात नहीं है, क्योंकि घटादि तो नेत्र या प्रकाश न होनेपर भी अन्य साधनोंसे भास जाते हैं; जैसे—] अन्धा आदमी प्रकाश न होनेपर भी वस्तुओंको स्पर्शादिके द्वारा जान ही लेता है तथा अन्धे आदमीको रूपका भान न होनेपर भी स्मृतिमें उसका भान होता ही है; किन्तु चेतनके विषयमें ऐसी बात नहीं है, चेतनका भान न होनेपर भला कब किसीको कहीं किसी वस्तु- का भान हुआ है ? ॥ ६२ उ०-६३ ॥

२७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथाऽऽदर्शं विना किञ्चित् प्रतिबिम्बं न भाति वै । आदर्शान्नातिरिक्तोऽतः प्रतिबिम्बो भवेद्यथा ॥ ६४ ॥ एवं चितिमृते किञ्चिदतिरिक्तं न विद्यते । अतएव मनोऽप्यन्यत् सर्वथा नास्ति वै चितेः ॥ ६५ ॥ यथा स्वप्ने मनस्तद्वज्जाग्रत्यपि मनो न हि । कल्पितं कार्यसंसिद्ध्यै करणं केवलं मनः ॥ ६६ ॥ यथा स्वाप्नः कुठारः स्यात् करणं तरुछेदने । राम क्रियाऽसत्यरूपा सत्यं तत् करणं कथम् ॥ ६७ ॥ असता नरशृङ्गेण कः कदा सुविदारितः । तस्मान्नास्ति मनो राम चासत्कार्यस्य कारणम् ॥ ६८ ॥ स्वप्ने दृशिः क्रिया कार्यं कारणं मन उच्यते । यथा तथा सर्वदापि मनो नास्ति क्रियाकरम् ॥ ६९ ॥ जिस प्रकार दर्पणके बिना कोई भी प्रतिबिम्ब नहीं भासता और इसीसे जैसे दर्पणसे भिन्न प्रतिबिम्ब है ही नहीं, इसी प्रकार चेतनके बिना और चेतनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। अतः मन भी चेतनसे भिन्न बिलकुल नहीं है ॥ ६४-६५ ॥ जैसे स्वप्नमें [स्वाप्न पदार्थों से भिन्न] मन नहीं है उसी प्रकार जाग्रत्में भी मनकी पृथक् सत्ता नहीं है। स्वप्नके समान जाग्रत्में भी कार्यनिर्वाहके लिये करणरूपसे मन की कल्पना हो जाती है ॥ ६६॥ जिस प्रकार स्वप्नमें पेड़ काटनेके लिये स्वप्नकी ही कुल्हाड़ी होती है [वैसे ही मन भी कल्पित ही होता है]। परशुराम! यदि स्वप्नकी क्रिया असत्य है तो उसका साधन ही कैसे सत्य हो सकता है ॥ ६७ ॥ मनुष्यके सींग होता ही नहीं। फिर उस अलीक नरशृंगसे कोई कब विदीर्ण हो सकता है। अतः परशुराम! स्वप्नमें असत्य कार्यका कारण मन है ही नहीं ॥ ६८ ॥ स्वप्नमें जैसे दृकशक्ति ही क्रियारूप कार्य और उसका कारण मन कही जाती है उसी प्रकार सर्वदा ही जाग्रत् कालमें भी क्रिया करनेवाला मन वास्तवमें नहीं है ॥ ६९ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७१ चिदात्मा केवलः स्वच्छः स्वाच्छन्द्यान्मन आदिकम्। परिकल्प्य व्यवहरेत् दृश्यद्रष्ट्रादिभेदतः ॥ ७० ॥ क्वचित् क्वचित् केवलं तु निर्विकल्पात्मना स्थितः । शृणु भार्गव चित्तत्त्वं परिपूर्णमपि स्वयम् ॥ ७१ ॥ नाकाशतुल्यं चैतन्यात् स्वप्रकाशमतः स्थितम्। आकाशश्च चिदात्मा च न विलक्षणतां गतौ ॥ ७२ ॥ पूर्णः सूक्ष्मो निर्मलश्चाजोऽनन्तोऽपि निराकृतिः । सर्वाधारोऽप्यसङ्गात्मा सर्वान्तरबहिर्भवः ॥ ७३ ॥ विशेषस्तत्र चैतन्यमाकाशे तन्न विद्यते । वस्तुतश्चैतन्यपूर्ण आत्मैवाकाश उच्यते ॥ ७४ ॥ नह्यात्माकाशयोर्भेदो लेशतोऽपि हि विद्यते । य आकाशः स आत्मैव यथात्माऽऽकाश एव सः॥ ७५ ॥ अज्ञाः पश्यन्त्यात्मरूपमाकाशमिति वै भ्रमात् । केवल शुद्ध चिदात्मा ही अपने स्वातन्त्र्यसे मन आदिकी कल्पना करके कभी तो द्रष्टा और दृश्य आदि भेदरूपसे व्यवहार करता है और कभी केवल निर्विकल्प रूपसे स्थित रहता है ॥ ७०-७१ पू० ॥ भृगुनन्दन ! सुनो, चित्तत्त्व स्वयं परिपूर्ण होनेके कारण आकाश के समान नहीं है। इसीसे वह स्वयंप्रकाश भी है। [आकाशकी तरह जड़ नहीं है।] इसके सिवा आकाश और चिदात्मामें कोई और भेद नहीं है ॥ ७१ उ०-७२ ॥ आकाशकी तरह चिदात्मा भी परिपूर्ण, सूक्ष्म, निर्मल, अजन्मा, अनन्त, निराकार, सबका आधार, असङ्ग और सबके भीतर-बाहर रहनेवाला है। उसमें विशेषता केवल चैतन्यकी ही है, आकाशमें यह गुण नहीं है। वास्तवमें तो चैतन्यसे पूर्ण आकाश ही 'आत्मा' कहा जाता है ॥ ७३-७४ ॥ आकाश और आत्माका और कोई लेशमात्र भी अन्तर नहीं है। जो आकाश है वही आत्मा है और जो आत्मा है वही आकाश है ॥ ७५ ॥ अज्ञानी लोग भ्रमवश आत्माके स्वरूपको ही आकाशरूपमें देखते हैं;

२७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सौरालोकं यथोलूकस्तमोमात्रं प्रपश्यति ॥ ७६ ॥ आकाशमेव विज्ञास्तु पश्यन्त्यात्मचिदात्मकम् । परा चितिः परेशानी स्वच्छस्वातन्त्र्यवैभवात् ॥ ७७ ॥ अवभासयदात्मानं परिच्छिन्नमनेकधा । यथा राम स्वमात्मानं स्वप्ने बहुविधं पृथक् ॥ ७८ ॥ मनुष्यादिविभेदेन भासयत्येवमेव हि । अनेकधावभासोऽपि परिच्छिन्नदृशैव हि ॥ ७९ ॥ स्वयं स्वदृष्ट्या पूर्णात्मरूपिण्येव परा चितिः । ऐन्द्रजालिक एकोऽपि स्वमात्मानमनेकधा ॥ ८० ॥ भासयंस्तत्र द्रष्टॄणां स्वदृष्ट्या भासयेत् स्वयम् । एक एव निर्विकार एवं सा परमा चितिः ॥ ८१ ॥ शुद्धैकरूपभासापि परिच्छिन्ना ह्यनेकधा । परिच्छिन्नस्वरूपाणां भासयेन्मायया वृता ॥ ८२ ॥ जैसे उल्लू सूर्यके प्रकाशको ही अन्धकाररूपमें देखा करते हैं ॥ ७६ ॥ ज्ञानी पुरुष तो आकाशको ही चेतन आत्माके रूपमें देखते हैं। भगवती पराचिति अपने निर्दोष स्वातन्त्र्यके बलसे अपने स्वरूपको ही अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न रूपोंमें प्रकट करती है, जिस प्रकार कि परशुरामजी ! स्वप्नावस्थामें वह मनुष्यादि अनेकों रूपोंमें स्वयं ही भासित हुआ करती है ॥ ७७-७९ पू० ॥ उसका यह अनेकरूपसे भासना भी परिच्छिन्न दृष्टिसे ही है। स्वयं अपनी दृष्टिमें तो वह पराचिति परिपूर्ण आत्मस्वरूपिणी ही है ॥ ७९ उ०-८० पू० ॥ जिस प्रकार ऐन्द्रजालिक (जादूगर) अकेला होनेपर भी अपनेको दर्शकोंके प्रति अनेकों रूपोंमें आभासित करनेपर भी अपनी दृष्टिसे तो स्वयं अकेला ही रहता है ॥ ८० उ०-८१ पू० ॥ इसी प्रकार वह पराचिति एक और निर्विकार ही है तथा [अपनी दृष्टिमें] शुद्ध एकरूपमें ही भासती भी है, तथापि मायासे आवृत होनेपर वह परिच्छिन्न होकर अनेकों परिच्छिन्न रूपोंको भासित करने लगती है ॥ ८१ उ०-८२ ॥