भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

२५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ज्ञानज्ञेयाविभेदेन त्वज्ञातं ज्ञातमुच्यते । एवमेष भवेदात्मविज्ञानक्रम उत्तमः ॥ ११२ ॥ ब्रह्मन्नेवं श्रुतं भूयो विचार्य ज्ञातुमर्हसि । अथ विज्ञायात्मतत्त्वं कृतार्थस्त्वं भविष्यसि ॥ ११३ ॥ जनकेनैवमादिष्टस्त्वष्टावक्रो महामुनिः । पूजितस्त्वभ्यनुज्ञातो गत्वा स्वस्थानमादरात् ॥ ११४ ॥ विचारानुध्यानपूर्वं विज्ञाय परमं पदम् । विधूय सर्वसन्देहान् जीवन्मुक्तो भवेद् द्रुतम् ॥ ११५ ॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावकीये सप्तदशोऽध्यायः । विशुद्ध ज्ञान और उससे भासित होनेवाले ज्ञेय पदार्थका भेद न जाननेके कारण जो आत्मतत्त्व पहले अज्ञात था [उनका भेद ज्ञात होने- पर] अब वही ज्ञात कहा जाता है । इस प्रकार यही आत्मज्ञानका उत्तम क्रम है ॥ ११२ ॥ ब्रह्मन् ! आपने जो यह आत्मज्ञानका क्रम सुना है इसपर बार-बार विचार करनेसे आपको भी ज्ञान हो सकता है । फिर ज्ञान प्राप्त करके आप कृतकृत्य हो जायेंगे" ॥ ११३ ॥ इस प्रकार ·अष्टावक्र मुनिने जनकसे उपदेश प्राप्त किया, फिर जनकने पूजा करके उन्हें विदा किया । तदनन्तर अपने स्थानपर उन्होंने आदरपूर्वक मनन और निदिध्यासन करके उस परम पदको जान लिया । उनके सभी संशय निवृत्त हो गये और उन्हें तत्काल जीवन्मुक्तपदकी प्राप्ति हो गयी ॥ ११४-११५ ॥ सप्तदश अध्याय समाप्त ।