भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 273

अष्टादशोऽध्यायः भार्गवैवं हि सा संविद्वेद्यवन्ध्या निरूपिता । उपलब्धिदशा तस्या बहुधा संश्रुता ननु ॥ १ ॥ अव्युत्पत्त्या न जानन्ति जना मायाविमोहिताः । सा दशा भाव्यते सूक्ष्मदृशैव नान्यथा क्वचित् ॥ २ ॥ किं बहूक्तेन ते राम शृणु सारं ब्रवीम्यहम् । मनसा वेद्यते वेद्यं मनसोऽतो न वेद्यता ॥ ३ ॥ तथा च वेद्यनिर्मुक्तं मनोऽप्यस्तीति सम्भवेत् । तन्मनो वेद्यनिर्मुक्तवित्तिरित्यभिधीयते ॥ ४ ॥ उपलब्धिस्वरूपत्वाद्विदितैव हि सा सदा । अन्योपलब्ध्यपेक्षायामन्ध्यं स्यादनवस्थितेः ॥ ५ ॥ अष्टादश अध्याय ॥ १८ ॥ जनक और अष्टावक्रके संवादका शेषभाग [ श्रीदत्तात्रेयजीने कहा—] परशुराम ! इस प्रकार मैंने उस वेद्य- वस्तुविहीन शुद्ध संवित्का निरूपण किया और तुमने व्यवहारमें उसकी उपलब्धिकी अनेकों अवस्थाओंके विषयमें भी सुना ॥ १ ॥ किन्तु मायामोहित पुरुषोंको समझ न होनेके कारण उसकी पहचान नहीं होती। उस स्थितिका ज्ञान तो [ अन्तर्मुख मनसे ] केवल सूक्ष्मदर्शियोंको ही होता है, अन्य किसी प्रकार नहीं ॥ २ ॥ परशुराम ! अधिक कहनेसे क्या लाभ ? सुनो, मैं सार बात बतलाता हूँ। मनसे तो दृश्य पदार्थ जाने जाते हैं, इसलिये मन दृश्य नहीं है ॥ ३ ॥ परन्तु दृश्य न रहनेपर भी मन रहता है—यह भी निश्चय है। बस, वह वेद्यविहीन मन ही ‘शुद्ध संवित्’ कहा जाता है ॥ ४ ॥ वह ज्ञानस्वरूप है, इसलिये सर्वदा प्रकाशमान ही है। यदि उसकी उपलब्धिके लिये किसी अन्यकी अपेक्षा मानी जाय तो [ उस अन्यके लिये उससे भिन्नकी और उसके लिये उससे भिन्नकी अपेक्षा होगी ] इस प्रकार अनवस्था दोष उपस्थित होगा और फिर [ कोई स्वयंप्रकाश तत्त्व न रहनेके कारण ] सर्वत्र अन्धकार ही शेष रहेगा [ अर्थात् किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं हो सकेगा ] ॥ ५ ॥