भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 274

२६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे किञ्चिद्भावं हि संपश्यन्न भासि किमु भार्गव । न भासि चेन्न त्वमसि ततः प्रश्नस्तु ते कथम् ॥ ६ ॥ अहो स्वयं खपुष्पात्मा सन् कथं हि तमिच्छसि । कथं त्वात्मानमहं साधयामि विभावय ॥ ७ ॥ सामान्येन विभान्तं मां न जानामि विशेषतः । इति चेद्राम सामान्यमेव ते रूपमव्ययम् ॥ ८ ॥ विशेषलेशरहितमेतावद्ध्येव ते वपुः । अहो जानन्नपि पुनरलं मुह्यसि वै वृथा ॥ ९ ॥ भासकं सर्वमपि च विशेषविषयं भवेत् । अतः सामान्यरूपस्त्वं विभासि स्वत एव हि ॥ १० ॥ शरीराद्यात्मना भासि चेच्छृणु प्रब्रवीमि ते । भृगुनन्दन ! किसी भी पदार्थको देखते समय क्या तुम्हें अपना भान नहीं होता ? यदि नहीं होता तो तुम हो ही नहीं, फिर प्रश्न किस प्रकार करते हो ? ॥ ६ ॥ अजी ! यदि तुम आकाशकुसुमके समान अलीक हो, तो फिर तुम अपनेको जानना क्यों चाहते हो ? सोचो तो, फिर मैं तुम्हारे स्वरूपको सिद्ध ही कैसे कर सकता हूँ ? ॥ ७ ॥ यदि कहो कि मैं सामान्यरूपसे तो भासता हूँ परन्तु विशेषरूपसे अपनेको नहीं जानता, तो यह सामान्य ही तो तुम्हारा अविनाशी स्वरूप है ॥ ८ ॥ जिसमें किसी प्रकारके विशेषका लेश भी नहीं है वही तुम्हारा स्वरूप है । आश्चर्य है, कि इसप्रकार अपनेको जानते हुए भी तुम व्यर्थ ही भ्रममें पड़े हुए हो ॥ ६ ॥ सबको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान भी विशेषविषयक होता है ।¹ अतः तुम तो केवल सामान्यरूप हो और स्वयं ही प्रकाशमान हो ॥१०॥ यदि कहो कि मैं शरीरादिरूपसे भासता हूँ, तो सुनो मैं बतलाता १. घट-पट आदि विषयोंको प्रकाशित करनेवाला ज्ञान उन अपने भास्य विषयोंके द्वारा निरूपित होता है, इसलिये घटज्ञान-पटज्ञान आदि रूपसे वह विशेष- विषयक कहा जाता है । स्वरूपभूत शुद्ध ज्ञान तो विषयविवर्जित है । अतः वह ज्ञानसामान्य है और ज्ञानमात्र होनेके कारण स्वयंप्रकाश ही है ।