भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 275

अष्टादशोऽध्यायः। २६१ शरीरात्मतया भासि सङ्कल्पेनैव नान्यथा ॥ ११ ॥ विभावय सूक्ष्मदृशा सङ्कल्पेऽन्यस्य देहतः। भाति किं तव देहत्वं देहस्तच्चापि ते भवेत् ॥ १२ ॥ एवं सङ्कल्प्यते यद्यच्छरीरं तत्तदेव हि। तेन सर्वमयस्त्वं स्याः कथं देहात्ममात्रकः ॥ १३ ॥ तस्माद् दृश्यं तव वपुर्न हि स्याद्व्यभिचारतः। तस्माद् दृङ्मात्ररूपोऽसि न दृग् दृश्या कदाचन ॥ १४ ॥ सा स्वप्रभा दृश्यरूपविशेषलेशवर्जिता । देहदेशकालभेदचित्रवैचित्र्यचित्रिता ॥ १५ ॥ तस्मात् सङ्कल्पमात्रस्य वर्जनात् परतः स्थितम्। शेषं शुद्धचिते रूपं स्वात्मानमुपलक्षय ॥ १६ ॥ हूँ। शरीरादि रूपसे तो तुम शरीरादिका संकल्प होनेपर ही भासते हो, स्वतः नहीं ॥ ११॥ सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो, जब तुम्हें देहसे भिन्न किसी अन्य वस्तुका संकल्प होता है तब क्या तुम्हें अपनी देहरूपता भासती है ? [यदि शरीरके साथ सम्बन्ध भासनेके कारण ही तुम शरीरको अपना स्वरूप मानते हो] तब तो सम्बन्ध होनेके कारण वे अन्य पदार्थ भी तुम्हारे शरीर सिद्ध होंगे ॥ १२ ॥ इस प्रकार तो तुम्हारे द्वारा जिस-जिसका संकल्प होगा वही तुम्हारा शरीर सिद्ध होगा। इस तरह तो तुम सर्वस्वरूप हो जाओगे, फिर केवल एक शरीरमात्र कैसे रहोगे ? ॥ १३ ॥ अतः कोई भी दृश्य तुम्हारा स्वरूप नहीं हो सकता, क्योंकि वह परिवर्तनशील होगा। इसलिये तुम ज्ञानमात्र हो ज्ञानके विषय कभी नहीं ॥ १४ ॥ वह स्वरूपभूत ज्ञान स्वयंप्रकाश है, उसमें ज्ञेयरूप विशेषका लेश भी नहीं है तथा [सबका आश्रय होनेके कारण] वह देह, देश और कालभेद रूप चित्रकी विचित्रतासे अंकित है ॥ १५ ॥ अतः संकल्पमात्रके त्यागने पर जो सबसे अतीत शुद्ध चेतनका स्वरूप शेष रह जाता है उसीको तुम अपना आत्मा जानो ॥ १६ ॥