त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एवं सकृल्लक्षिते तु यत् स्थितं तदलक्षणात् । अज्ञानं सर्वसंसारकारणं तद्विलीयते ॥ १७ ॥ न मोक्षो नभसः पृष्ठे न पाताले न भूतले । सङ्कल्पवर्जनाच्छुद्धस्वरूपस्य प्रथैव सः ॥ १८ ॥ स स्वरूपात्मकत्वात्तु नाऽप्राप्तः स्यात् कदाचन । केवलं मोहमात्रस्य निरासेन कृतार्थता ॥ १९ ॥ अन्यो मोक्षो न सम्भाव्यः कृतकत्वाद्विनाश्यते । स्वरूपादतिरिक्तश्चेच्छशशृङ्गसमो हि सः ॥ २० ॥ स्वरूपं सर्वतः पूर्णमन्यो मोक्षः क्व सम्भवेत् । स्वरूपे सम्भवन् मोक्षो दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ २१ ॥ लोकेऽपि बन्धविगमादृते मोक्षो न भावितः । विगमोऽभाव एव स्यात् सत्यो भावात्मकः कथम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार जब एक बार उसे लख लिया जाता है तो उसमें जो देहादि भासते हैं उनपर दृष्टि न रहनेके कारण सम्पूर्ण संसारका कारण जो अज्ञान है वह लीन हो जाता है ॥ १७ ॥ मोक्ष न आकाशकें ऊपर है, न पाताल या भूतलमें है। बस, संकल्पत्यागके द्वारा जो शुद्धस्वरूपमें स्थिति है वही 'मोक्ष' है ॥ १८ ॥ वह स्वरूपभूत ही है, इसलिये कभी अप्राप्त भी नहीं है। केवल मोहमात्रका त्याग होनेपर ही कृतकृत्यता हो जाती है ॥ १६ ॥ इसके सिवा कोई और मोक्ष होना सम्भव नहीं है, क्योंकि वह कृतक ( क्रियासाध्य ) होनेके कारण नष्ट हो जायगा । और यदि वह स्वरूपसे भिन्न हुआ तो खरगोशके सींगोंके समान अलीक ही होगा ॥ २० ॥ अपना स्वरूप तो सभी ओर परिपूर्ण है, फिर उससे भिन्न कोई अन्य मोक्ष कहाँ हो सकता है ? यदि उसे स्वरूपमें ही माना जाय तब तो वह दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान उससे अभिन्न ही होगा ॥२१॥ लोकमें भी बन्धनकी निवृत्तिके सिवा मोक्ष और कुछ नहीं माना गया । और 'निवृत्ति' अभावरूप ही होती है, अतः अभावात्मक बन्ध- निवृत्ति सत्य ( भावरूप ) कैसे हो सकती है ? ॥ २२ ॥