भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

अष्टादशोऽध्यायः । २६३ भावाभावात्मकं वस्तु न हि सम्भवति क्वचित् । तथा च स्वाप्नभावाश्च भावाभावोभयात्मकाः ॥ २३ ॥ सत्याः स्युर्बाधहेतोस्ते त्वसत्या इति चेच्छृणु । बाधोऽभावप्रत्ययः स्यात् प्रत्ययाभावकालिकः ॥ २४ ॥ यस्यैवं बाधयोगः स्यात् सोऽसत्यो न हि चेतरः । अस्ति सर्वस्य दृश्यस्य बाधोऽप्रत्ययकालिकः ॥ २५ ॥ तस्मादसत्यमेव स्यात् भावाभावात्मना स्थितम् । यस्याभावस्पर्शलेशः कदाचित् कुत्रचिन्नहि ॥ २६ ॥ एवंविधन्तु चित्तत्त्वं सत्यं सर्वात्मना स्थितम् । तस्माद्विभिन्नमोक्षस्तु न सत्यः स्यात् कथञ्चन ॥ २७ ॥ मोक्षः पूर्णस्वरूपस्य सकृत् प्रथनमुच्यते । चेत्यवर्जनमात्रेण चितिः पूर्णा प्रकीर्त्तिता ॥ २८ ॥ चेत्याभासनमेवास्याश्चितेः सङ्कोचनं भवेत् । किसी भी वस्तुका भावाभावात्मक (सत्य और असत्य उभयरूप) होना तो कभी सम्भव ही नहीं है। यदि कहो कि स्वप्नके पदार्थ तो भावाभाव उभयरूप ही हैं, क्योंकि उपलब्ध होनेके कारण वे सत्य हैं और जाग्रत्कालमें बाधित हो जानेके कारण असत्य भी हैं, तो सुनो—॥ २३-२४ पू० ॥ पदार्थकी प्रतीति न होनेके समय जो उसकी अभावात्मिका प्रतीति होती है उसका नाम बाध है। जिसका इस प्रकार बाधसे सम्बन्ध रहता है वह पदार्थ असत्य होता है, अन्य नहीं ॥ २४ उ०-२५ पू० ॥ यह अप्रतीतिकालिक बाध सभी दृश्यवर्गका होता है, अतः भावा- भावात्मक रूपसे स्थित सारा दृश्य असत्य ही है ॥ २५ उ०-२६ पू० ॥ किन्तु जिसे कभी किसी अवस्था में अभावका लेशमात्र भी स्पर्श नहीं होता ऐसा चेतनतत्त्व तो सब प्रकार सत्य ही है। उससे भिन्न जो मोक्ष होगा वह किसी प्रकार सत्य नहीं हो सकता ॥ २६ उ०-२७ ॥ उस पूर्णस्वरूपका निरन्तर स्फुरण ही मोक्ष कहा जाता है। चेत्य पदार्थोंके त्यागमात्रसे चेतन पूर्ण कहा जाता है ॥ २८ ॥ चेत्य पदार्थोंका भासना ही चेतनका संकुचित होना है। जब