त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे चेत्याभाने चितिः पूर्णा परिच्छेदविवर्जनात् ॥ २९ ॥ कालादिभिः परिच्छेदो यदि तस्या निरूप्यते । अचेतितः परिच्छेदश्चेतितो वा भवेद्वद ॥ ३० ॥ अचेतने ह्यसिद्धः स्याच्चेतने सैव व्यापिका । लोके कालपरिच्छिन्नो भावो यः कोऽपि भावितः ॥ ३१ ॥ भावकालौ परिच्छेद्यपरिच्छेदकतां गतौ । चिता व्याप्तौ भवेतां वै यदा तर्हि तथाविधौ ॥ ३२ ॥ अन्याप्तौ तु चिता यहिं कथं सिद्ध्येत् परिच्छिदिः । चितेर्बहिर्यदा चेत्यमस्ति तत् स्यात् परिच्छिदिः ॥ ३३ ॥ चितेर्बहिहिश्चेत्यसिद्धिः सर्वथा नोपपद्यते । चेत्यका भान न रहे तो परिच्छेद न रहनेके कारण चेतन परिपूर्ण ही है ॥ २९ ॥ यदि कोई कहे कि कालादिके द्वारा उसका परिच्छेद हो सकता है, तो बताओ कि वह परिच्छेद चेतनसे अप्रकाशित होगा अथवा प्रकाशित ? ॥ ३० ॥ यदि वह चेतनसे अप्रकाशित होगा तब तो उसकी सिद्धि ही नहीं हो सकती और यदि प्रकाशित होगा तो वह व्यापक चेतन ही होगा। लोकमें जो भी पदार्थ कालपरिच्छिन्न माना जाता है उसमें उस पदार्थ और कालका परिच्छेद्य-परिच्छेदकरूप सम्बन्ध रहता है। किन्तु वे पदार्थ और काल दोनों ही चेतनसे व्याप्त रहते हैं तभी वे उस रूपमें भासते हैं ॥ ३१-३२ ॥ यदि वे चेतनसे व्याप्त न हों तो उनका परिच्छेद भी कैसे सिद्ध होगा¹। [ तथापि चेतन तो व्यापक और अद्वितीय है, ] क्योंकि उसका परिच्छेद तो तभी हो सकता है यदि उससे बाहर कोई चेत्य पदार्थ हो ॥ ३३ ॥ किन्तु चेतनसे बाहर तो चेत्यकी सत्ता किसी प्रकार सिद्ध नहीं १. 'चेतनसे व्याप्त न होने' का अर्थ है चेतनसे प्रकाशित न होना । जो वस्तु, भाव या सम्बन्ध चेतनसे प्रकाशित न हो उसका भान किसे होगा और किसीको भी भान न होनेपर उसकी सत्ता कैसे सिद्ध होगी ?