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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

२६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे चेत्याभाने चितिः पूर्णा परिच्छेदविवर्जनात् ॥ २९ ॥ कालादिभिः परिच्छेदो यदि तस्या निरूप्यते । अचेतितः परिच्छेदश्चेतितो वा भवेद्वद ॥ ३० ॥ अचेतने ह्यसिद्धः स्याच्चेतने सैव व्यापिका । लोके कालपरिच्छिन्नो भावो यः कोऽपि भावितः ॥ ३१ ॥ भावकालौ परिच्छेद्यपरिच्छेदकतां गतौ । चिता व्याप्तौ भवेतां वै यदा तर्हि तथाविधौ ॥ ३२ ॥ अन्याप्तौ तु चिता यहिं कथं सिद्ध्येत् परिच्छिदिः । चितेर्बहिर्यदा चेत्यमस्ति तत् स्यात् परिच्छिदिः ॥ ३३ ॥ चितेर्बहिहिश्चेत्यसिद्धिः सर्वथा नोपपद्यते । चेत्यका भान न रहे तो परिच्छेद न रहनेके कारण चेतन परिपूर्ण ही है ॥ २९ ॥ यदि कोई कहे कि कालादिके द्वारा उसका परिच्छेद हो सकता है, तो बताओ कि वह परिच्छेद चेतनसे अप्रकाशित होगा अथवा प्रकाशित ? ॥ ३० ॥ यदि वह चेतनसे अप्रकाशित होगा तब तो उसकी सिद्धि ही नहीं हो सकती और यदि प्रकाशित होगा तो वह व्यापक चेतन ही होगा। लोकमें जो भी पदार्थ कालपरिच्छिन्न माना जाता है उसमें उस पदार्थ और कालका परिच्छेद्य-परिच्छेदकरूप सम्बन्ध रहता है। किन्तु वे पदार्थ और काल दोनों ही चेतनसे व्याप्त रहते हैं तभी वे उस रूपमें भासते हैं ॥ ३१-३२ ॥ यदि वे चेतनसे व्याप्त न हों तो उनका परिच्छेद भी कैसे सिद्ध होगा¹। [ तथापि चेतन तो व्यापक और अद्वितीय है, ] क्योंकि उसका परिच्छेद तो तभी हो सकता है यदि उससे बाहर कोई चेत्य पदार्थ हो ॥ ३३ ॥ किन्तु चेतनसे बाहर तो चेत्यकी सत्ता किसी प्रकार सिद्ध नहीं १. 'चेतनसे व्याप्त न होने' का अर्थ है चेतनसे प्रकाशित न होना । जो वस्तु, भाव या सम्बन्ध चेतनसे प्रकाशित न हो उसका भान किसे होगा और किसीको भी भान न होनेपर उसकी सत्ता कैसे सिद्ध होगी ?

अष्टादशोऽध्यायः। २६५ यो बहिः स कथं सिद्धयेच्चितिसम्बन्धवर्जितः ॥ ३४ ॥ सम्बन्धोऽपि नैकदेशः स्यादसिद्धस्तथेतरः । तत्सम्बन्धांशमात्रस्य भानादन्यन्न सिद्ध्यति ॥ ३५ ॥ अतो बहिः पदार्थोऽपि चितिनिर्मग्न इष्यताम् । एवं च सर्वात्मनैव मग्नं चेत्यमपीष्यताम् ॥ ३६ ॥ कथं स्वान्तर्विनिर्मग्नं स्वपरिच्छेदकं भवेत् । चेत्यमेवंविधं राम विचारय सुयुक्तिः ॥ ३७ ॥ चितेरन्तर्भासमानं प्रतिबिम्बात्मकं भवेत् । न भावोदरगोऽभावो भवन् लोके सुदृश्यते ॥ ३८ ॥ भावानां स्याद्धि साङ्कर्यं तथा चेद्राम सर्वतः । बहिः पदार्थस्ते प्रोक्तो भ्रममूलो हि सर्वथा ॥ ३९ ॥ तदाश्रयाणां भावानां कथं स्यात् सत्यता वद । चितिस्वरूपः स्वात्मैव तत्तद्भावात्मना सदा ॥ ४० ॥ हो सकती; क्योंकि चेतनसे सम्बन्ध न रखकर जो पदार्थ उससे बाहर होगा उसकी सिद्धि कैसे होगी ? ॥ ३४ ॥ वह चेत्य और चेतनका सम्बन्ध भी एक देशमें नहीं माना जा सकता । यदि ऐसा माना जाय तो चेत्यके अन्य अंशकी सिद्धि नहीं हो सकती । उस सम्बन्धित अंशमात्रका भान होनेसे ही अन्य अंश तो सिद्ध नहीं हो जाता ॥ ३५ ॥ अतः बाह्य पदार्थोंको भी चेतनमें डूबे हुए समझो । इस प्रकार चेत्यवर्गको भी सर्वथा चेतनके गर्भमें ही अनुभव करो ॥ ३६ ॥ जो चेत्य अपनेमें ही निमग्न है वह अपना ही परिच्छेदक कैसे हो सकता है ? हे परशुराम ! इस प्रकार युक्तिपूर्वक विचार करो ॥३७॥ जो वस्तु चेतनके भीतर भासती है वह प्रतिबिम्बरूप ही हो सकती है, क्योंकि लोकमें किसी एक पदार्थके भीतर रहनेवाला दूसरा पदार्थ देखा नहीं जाता ॥ ३८ ॥ परशुराम ! यदि ऐसा माना जायगा तब तो सर्वत्र पदार्थोंका घोटाला हो जायगा । यह बात पहले कही ही जा चुकी है कि बाह्य पदार्थ सर्वथा भ्रममूलक हैं । तो बताओ, उस बाह्याभासके आश्रित रहनेवाली वस्तुओंकी सत्यता कैसे सिद्ध हो सकती है ? ॥३६-४० पू०॥

२६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भासते स्वाच्छन्द्यशक्त्या नाधिकं विद्यते क्वचित् । इति वाक्यं समाकर्ण्य पुनः पप्रच्छ भार्गवः ॥ ४१ ॥ भगवन् भवता प्रोक्तं दुर्घटं प्रतिभाति मे । शुद्धा चितिर्विचित्रैका भासते इत्यसम्भवात् ॥ ४२ ॥ चितिश्चेत्यमिति द्वेधा वस्तु सर्वैर्विभावितम् । तत्र चेत्यं चिता भास्यं स्वप्रभा चितिरस्तु वै ॥ ४३ ॥ यथा लोकभातमपि वस्तु तद्भिन्नमस्ति वै । एवं चिता भासितं तु चेत्यमस्तु पृथग्विधम् ॥ ४४ ॥ चेत्यं चिदात्मकमिति नानुभूतिं समारुहेत् । अथ च प्रागभिहितं जनकेन महात्मना ॥ ४५ ॥ सङ्कल्पवर्जनादेव निर्विकल्पं मनो भवेत् । तदेव निर्विकल्पं स्याज्ज्ञानं संसारनाशनम् ॥ ४६ ॥ अतः चेतनस्वरूप अपना आत्मा ही अपनी स्वातन्त्र्यशक्तिके द्वारा उस-उस वस्तुके रूपमें सदा भास रहा है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है ॥ ४० उ०-४१ पू० ॥ दत्तात्रेयजीका यह उपदेश सुनकर परशुरामजीने फिर पूछा— “भगवन् ! आप जो कुछ बता रहे हैं वह तो मुझे असम्भव-सी बात जान पड़ती है। एक शुद्ध चेतन ही अनेक रूपमें भास रहा है—ऐसा तो हो नहीं सकता ॥ ४१ उ०-४२ ॥ चेतन और चेत्य—ये तो सभीने दो तत्त्व माने हैं। इनमें चेत्य चेतनसे भासित होता है, अतः चेतनका स्वयंप्रकाश होना तो ठीक है ॥ ४३ ॥ लोकमें जिस प्रकार भासित होनेवाली वस्तु भासकसे भिन्न होती है वैसे ही चेतनसे भासित चेत्यका उससे पृथक् होना भी उचित ही है। किन्तु चेत्य चेतनस्वरूप है—यह बात तो अनुभवमें नहीं आती ॥ ४४-४५ पू० ॥ इसके सिवा महात्मा जनकने जो पहले कहा कि संकल्प त्याग देनेसे ही मन निर्विकल्प हो जाता है। यही संसारकी निवृत्ति करनेवाला निर्विकल्प ज्ञान है और यही आत्माका भी स्वरूप है—

अष्टादशोऽध्यायः । २६७ तदेव ह्यात्मनो रूपमित्युक्तं तत् कथं भवेत् । आत्मनो हि मनः प्रोक्तं करणं ज्ञानकर्मणि ॥ ४७ ॥ मनो यद्यात्मनो न स्याद्विशिष्येत जडात् कथम् । मनो जडाद्विशेषः स्यादात्मनो भगवन्ननु ॥ ४८ ॥ मनसैव हि बन्धः स्यान्मोक्षो वाऽप्यात्मनः स्फुटम् । सविकल्पं मनो बन्धो मोक्षः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥ ४९ ॥ तत् कथं मन एवात्मा करणं हि मनः स्मृतम् । निर्विकल्पस्य संसिद्धावपि द्वैतं तु शिष्यते ॥ ५० ॥ अथापि लोके दृष्टोऽस्ति यस्य भ्रान्तिरसन् हि सः । न हि भ्रान्तिरसत्या स्यात्तदद्वैतं कथं भवेत् ॥ ५१ ॥ अर्थक्रिया न क्वचिच्च दृष्टा सत्येन वस्तुना । सो ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि ज्ञानरूप क्रियामें मन तो आत्माका करण कहा गया है ॥ ४५ उ०-४७ ॥ यदि आत्माके पास मन न हो तो जडवर्गसे उसका अन्तर कैसे होगा ? भगवन् ! आत्माका जो जडवर्गसे भेद है उसका कारण मन ही तो है ॥ ४८ ॥ तथा यह भी स्पष्ट है कि मनके कारण ही आत्माके बन्धन और मोक्ष होते हैं। सविकल्प मन ही आत्माका बन्धन है और निर्विकल्प ही उसका मोक्ष है ॥ ४९ ॥ ऐसी अवस्था में मन ही आत्मा कैसे हो सकता है ? मन तो उसका करण ही माना गया है। अतः निर्विकल्प मन मोक्षमें कारण हो भी तो भी [ आत्मा और मन-यह ] द्वैत तो रहता ही है ॥ ५० ॥ लोकमें यह भी देखा गया है कि जिस वस्तुकी भ्रान्ति होती है वही असत्य होती है। स्वयं भ्रान्ति तो असत्य नहीं होती¹। ऐसी अवस्थामें द्वैतका अभाव कैसे हो सकता है ॥ ५१ ॥ जो वस्तु असत्य होती है उसके द्वारा कभी व्यवहार होता भी १. तात्पर्य यह कि जैसे रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति होती है तो उसमें सर्प ही असत्य होता है, भ्रान्ति होने की घटना तो असत्य नहीं होती। अतः द्वैतका सर्वथा अभाव तो नहीं हुआ।

२६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वं हि जागतं वस्तु स्थिरमर्थक्रियाकरम् ॥ ५२ ॥ तदसत्यं कथं ब्रूहि यतोऽद्वैतं प्रसिद्ध्यति । सर्वं च भ्रान्तिविज्ञानं भ्रान्त्यभ्रान्तिभिदा कथम् ॥ ५३ ॥ भ्रान्तिः सर्वसमा वापि कथं स्याद् ब्रूहि मे गुरो । सन्देह एष विरतो हृदि मे परिवर्त्तते ॥ ५४ ॥ इत्येवं प्रश्नमाकर्ण्य दत्तात्रेयः समस्तवित् । साधुप्रश्नप्रहृष्टात्मा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५५ ॥ राम साधु त्वया पृष्टं प्रोक्तप्रायमिदं पुनः । यावन्न मनसस्तोषस्तावद् भूयो विशोधयेत् ॥ ५६ ॥ गुरुर्वापि कथं ब्रूयादपृष्टस्तन्मनोगतम् । प्राणिनां हि बुद्धिभेदात्तर्कः पृथगवस्थितः ॥ ५७ ॥ अपृष्ट्वा स्वस्वाऽभिमतं कः सन्देहाद्विमुच्यते । नहीं देखा गया । किन्तु संसारके सब पदार्थ तो स्थिर हैं और उनके द्वारा व्यवहार भी चल रहा है ॥ ५२ ॥ बताइये, वे असत्य कैसे हो सकते हैं, जिससे कि अद्वैतकी सिद्धि हो । यदि सारा ज्ञान भ्रान्तिरूप है तो इसमें भ्रान्ति और अभ्रा- न्तिका भेद भी कैसे होगा ? ॥ ५३ ॥ साथ ही, गुरुदेव ! यह भी बताइये कि यह भ्रान्ति सबको समान रूपसे क्यों भासती है ? मेरे हृदयमें यह बड़ा भारी सन्देह चक्कर काट रहा है” ॥ ५४ ॥ ऐसा प्रश्न सुनकर सर्वज्ञ दत्तात्रेयजीको इस सुन्दर प्रश्नके कारण बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहना आरम्भ किया—॥ ५५ ॥ “परशुराम ! तुमने सुन्दर प्रश्न किया । ये बातें प्रायः कही जा चुकी हैं । तथापि जबतक अपने मनको सन्तोष न हो तबतक बार- बार इनपर विचार करना ही चाहिये ॥ ५६ ॥ यदि पूछा न जाय तो गुरु भी शिष्यके मनमें छिपे सन्देहके विषयमें किस प्रकार कह सकते हैं । प्राणियोंकी बुद्धियाँ अनेक प्रकार की हैं, अतः उनके समाधानके लिये युक्तियाँ भी अलग- अलग हैं ॥ ५७ ॥ अतः अपने-अपने आशयके विषयमें प्रश्न किये बिना भला कौन

अष्टादशोऽध्यायः। २६६ प्रष्टुर्विद्या हि सुदृढा प्रश्नो बीजं निरूपणे ॥ ५८ ॥ अप्रष्टुर्नैव विद्या स्यात् पृष्ट्वा विद्यात्ततो गुरुम् । चितिरेकैव वैचित्र्याद्भासते इति सम्भवेत् ॥ ५९ ॥ एकरूपो यथाऽऽदर्शः प्रतिबिम्बादनेकधा । पश्य स्वाप्नविकल्पादौ मन एकं हि केवलम् ॥ ६० ॥ द्रष्टृदर्शनदृश्यात्मवैचित्र्येण विभाति हि । एवं शुद्धैव सा संविद्विचित्राकारभासिनी ॥ ६१ ॥ चितिश्चेत्यमिति द्वेधा स्वप्नेऽपि हि विभासते । आलोकमन्तरा त्वन्धो भावं जानाति वै ननु ॥ ६२ ॥ अन्धस्याभासमानश्च रूपं भाति स्मृतौ किल । नैवं चितेरभाने किं कदा कुत्र विभासते ॥ ६३ ॥ सन्देहसे छूट सकता है ? विद्या तो पूछनेवालेकी ही पक्की होती है, वास्तवमें प्रश्न ही निरूपणका बीज है। जो प्रश्न नहीं करता उसे विद्या (ज्ञान) प्राप्त नहीं होती, अतः प्रश्न करके ही गुरुदेवसे विद्या प्राप्त करनी चाहिये ॥ ५८-५९ पू० ॥ एक ही चैतन्य अनेकरूपोंमें भास रहा है—यह बात इसी प्रकार सम्भव है जैसे दर्पण एकरूप होनेपर भी प्रतिबिम्बके कारण अनेकरूप जान पड़ता है ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ देखो, स्वप्न और मनोराज्य आदिमें केवल एक ही मन द्रष्टा; दर्शन और दृश्य आदि अनेक रूपोंमें भासता ही है। इसी प्रकार वह संवित् शुद्ध होनेपर भी अनेक रूपोंमें भासनेवाली है। स्वप्नमें भी चिति और चेत्य-ये दो भेद भासते ही हैं। [यदि यह द्वैत स्वप्नमें मिथ्या है तो जाग्रत्में क्यों नहीं है ? ] ॥ ६० उ०-६२ पू० ॥ [तुमने कहा कि प्रकाश और घटादिके समान भासक और भास्य दोनोंहीकी सत्ता है, सो यह बात नहीं है, क्योंकि घटादि तो नेत्र या प्रकाश न होनेपर भी अन्य साधनोंसे भास जाते हैं; जैसे—] अन्धा आदमी प्रकाश न होनेपर भी वस्तुओंको स्पर्शादिके द्वारा जान ही लेता है तथा अन्धे आदमीको रूपका भान न होनेपर भी स्मृतिमें उसका भान होता ही है; किन्तु चेतनके विषयमें ऐसी बात नहीं है, चेतनका भान न होनेपर भला कब किसीको कहीं किसी वस्तु- का भान हुआ है ? ॥ ६२ उ०-६३ ॥

२७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथाऽऽदर्शं विना किञ्चित् प्रतिबिम्बं न भाति वै । आदर्शान्नातिरिक्तोऽतः प्रतिबिम्बो भवेद्यथा ॥ ६४ ॥ एवं चितिमृते किञ्चिदतिरिक्तं न विद्यते । अतएव मनोऽप्यन्यत् सर्वथा नास्ति वै चितेः ॥ ६५ ॥ यथा स्वप्ने मनस्तद्वज्जाग्रत्यपि मनो न हि । कल्पितं कार्यसंसिद्ध्यै करणं केवलं मनः ॥ ६६ ॥ यथा स्वाप्नः कुठारः स्यात् करणं तरुछेदने । राम क्रियाऽसत्यरूपा सत्यं तत् करणं कथम् ॥ ६७ ॥ असता नरशृङ्गेण कः कदा सुविदारितः । तस्मान्नास्ति मनो राम चासत्कार्यस्य कारणम् ॥ ६८ ॥ स्वप्ने दृशिः क्रिया कार्यं कारणं मन उच्यते । यथा तथा सर्वदापि मनो नास्ति क्रियाकरम् ॥ ६९ ॥ जिस प्रकार दर्पणके बिना कोई भी प्रतिबिम्ब नहीं भासता और इसीसे जैसे दर्पणसे भिन्न प्रतिबिम्ब है ही नहीं, इसी प्रकार चेतनके बिना और चेतनसे भिन्न कुछ भी नहीं है। अतः मन भी चेतनसे भिन्न बिलकुल नहीं है ॥ ६४-६५ ॥ जैसे स्वप्नमें [स्वाप्न पदार्थों से भिन्न] मन नहीं है उसी प्रकार जाग्रत्में भी मनकी पृथक् सत्ता नहीं है। स्वप्नके समान जाग्रत्में भी कार्यनिर्वाहके लिये करणरूपसे मन की कल्पना हो जाती है ॥ ६६॥ जिस प्रकार स्वप्नमें पेड़ काटनेके लिये स्वप्नकी ही कुल्हाड़ी होती है [वैसे ही मन भी कल्पित ही होता है]। परशुराम! यदि स्वप्नकी क्रिया असत्य है तो उसका साधन ही कैसे सत्य हो सकता है ॥ ६७ ॥ मनुष्यके सींग होता ही नहीं। फिर उस अलीक नरशृंगसे कोई कब विदीर्ण हो सकता है। अतः परशुराम! स्वप्नमें असत्य कार्यका कारण मन है ही नहीं ॥ ६८ ॥ स्वप्नमें जैसे दृकशक्ति ही क्रियारूप कार्य और उसका कारण मन कही जाती है उसी प्रकार सर्वदा ही जाग्रत् कालमें भी क्रिया करनेवाला मन वास्तवमें नहीं है ॥ ६९ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७१ चिदात्मा केवलः स्वच्छः स्वाच्छन्द्यान्मन आदिकम्। परिकल्प्य व्यवहरेत् दृश्यद्रष्ट्रादिभेदतः ॥ ७० ॥ क्वचित् क्वचित् केवलं तु निर्विकल्पात्मना स्थितः । शृणु भार्गव चित्तत्त्वं परिपूर्णमपि स्वयम् ॥ ७१ ॥ नाकाशतुल्यं चैतन्यात् स्वप्रकाशमतः स्थितम्। आकाशश्च चिदात्मा च न विलक्षणतां गतौ ॥ ७२ ॥ पूर्णः सूक्ष्मो निर्मलश्चाजोऽनन्तोऽपि निराकृतिः । सर्वाधारोऽप्यसङ्गात्मा सर्वान्तरबहिर्भवः ॥ ७३ ॥ विशेषस्तत्र चैतन्यमाकाशे तन्न विद्यते । वस्तुतश्चैतन्यपूर्ण आत्मैवाकाश उच्यते ॥ ७४ ॥ नह्यात्माकाशयोर्भेदो लेशतोऽपि हि विद्यते । य आकाशः स आत्मैव यथात्माऽऽकाश एव सः॥ ७५ ॥ अज्ञाः पश्यन्त्यात्मरूपमाकाशमिति वै भ्रमात् । केवल शुद्ध चिदात्मा ही अपने स्वातन्त्र्यसे मन आदिकी कल्पना करके कभी तो द्रष्टा और दृश्य आदि भेदरूपसे व्यवहार करता है और कभी केवल निर्विकल्प रूपसे स्थित रहता है ॥ ७०-७१ पू० ॥ भृगुनन्दन ! सुनो, चित्तत्त्व स्वयं परिपूर्ण होनेके कारण आकाश के समान नहीं है। इसीसे वह स्वयंप्रकाश भी है। [आकाशकी तरह जड़ नहीं है।] इसके सिवा आकाश और चिदात्मामें कोई और भेद नहीं है ॥ ७१ उ०-७२ ॥ आकाशकी तरह चिदात्मा भी परिपूर्ण, सूक्ष्म, निर्मल, अजन्मा, अनन्त, निराकार, सबका आधार, असङ्ग और सबके भीतर-बाहर रहनेवाला है। उसमें विशेषता केवल चैतन्यकी ही है, आकाशमें यह गुण नहीं है। वास्तवमें तो चैतन्यसे पूर्ण आकाश ही 'आत्मा' कहा जाता है ॥ ७३-७४ ॥ आकाश और आत्माका और कोई लेशमात्र भी अन्तर नहीं है। जो आकाश है वही आत्मा है और जो आत्मा है वही आकाश है ॥ ७५ ॥ अज्ञानी लोग भ्रमवश आत्माके स्वरूपको ही आकाशरूपमें देखते हैं;

२७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सौरालोकं यथोलूकस्तमोमात्रं प्रपश्यति ॥ ७६ ॥ आकाशमेव विज्ञास्तु पश्यन्त्यात्मचिदात्मकम् । परा चितिः परेशानी स्वच्छस्वातन्त्र्यवैभवात् ॥ ७७ ॥ अवभासयदात्मानं परिच्छिन्नमनेकधा । यथा राम स्वमात्मानं स्वप्ने बहुविधं पृथक् ॥ ७८ ॥ मनुष्यादिविभेदेन भासयत्येवमेव हि । अनेकधावभासोऽपि परिच्छिन्नदृशैव हि ॥ ७९ ॥ स्वयं स्वदृष्ट्या पूर्णात्मरूपिण्येव परा चितिः । ऐन्द्रजालिक एकोऽपि स्वमात्मानमनेकधा ॥ ८० ॥ भासयंस्तत्र द्रष्टॄणां स्वदृष्ट्या भासयेत् स्वयम् । एक एव निर्विकार एवं सा परमा चितिः ॥ ८१ ॥ शुद्धैकरूपभासापि परिच्छिन्ना ह्यनेकधा । परिच्छिन्नस्वरूपाणां भासयेन्मायया वृता ॥ ८२ ॥ जैसे उल्लू सूर्यके प्रकाशको ही अन्धकाररूपमें देखा करते हैं ॥ ७६ ॥ ज्ञानी पुरुष तो आकाशको ही चेतन आत्माके रूपमें देखते हैं। भगवती पराचिति अपने निर्दोष स्वातन्त्र्यके बलसे अपने स्वरूपको ही अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न रूपोंमें प्रकट करती है, जिस प्रकार कि परशुरामजी ! स्वप्नावस्थामें वह मनुष्यादि अनेकों रूपोंमें स्वयं ही भासित हुआ करती है ॥ ७७-७९ पू० ॥ उसका यह अनेकरूपसे भासना भी परिच्छिन्न दृष्टिसे ही है। स्वयं अपनी दृष्टिमें तो वह पराचिति परिपूर्ण आत्मस्वरूपिणी ही है ॥ ७९ उ०-८० पू० ॥ जिस प्रकार ऐन्द्रजालिक (जादूगर) अकेला होनेपर भी अपनेको दर्शकोंके प्रति अनेकों रूपोंमें आभासित करनेपर भी अपनी दृष्टिसे तो स्वयं अकेला ही रहता है ॥ ८० उ०-८१ पू० ॥ इसी प्रकार वह पराचिति एक और निर्विकार ही है तथा [अपनी दृष्टिमें] शुद्ध एकरूपमें ही भासती भी है, तथापि मायासे आवृत होनेपर वह परिच्छिन्न होकर अनेकों परिच्छिन्न रूपोंको भासित करने लगती है ॥ ८१ उ०-८२ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७३ मायावरणमप्येतत् परिच्छिन्नदृशो भवेत् । यथैन्द्रजालिको मायावृतश्चान्यदृशो भवेत् ॥ ८३ ॥ मायापरचितोऽत्यन्तं स्वातन्त्र्यमतिदुर्धटम् । लोकेऽपि योगिनोऽन्ये च मान्त्रिका ऐन्द्रजालिकाः॥ ८४ ॥ आच्छादितं स्वस्वातन्त्र्यं प्राप्य किञ्चित् सुयुक्तितः। दुर्घटं घटयन्त्येव ततो नैतद्विचित्रितम् ॥ ८५ ॥ एवं परचितेः स्वच्छस्वातन्त्र्यात् स्वात्मनो वपुः। अनेकधा परिच्छिन्नं भासितं भृगुनन्दन ॥ ८६ ॥ परिच्छेदोऽभिमानस्य त्वेकदेशे सुविश्रमः। साऽप्यपूर्णत्वविख्यातिर्याऽविद्या परिगीयते ॥ ८७ ॥ अत्र मुह्यन्ति बहवस्तार्किकाः पण्डिता अपि । स्वात्मानमनुदाहृत्य बहिर्दृष्टितया स्थितेः ॥ ८८ ॥ उसका यह मायारूप आवरण भी परिच्छिन्न दृष्टिवालोंके लिये ही है, जैसे ऐन्द्रजालिक दूसरोंकी दृष्टिमें ही मायासे आवृत्त होता है ॥ ८३ ॥ पराचितिका परमस्वातन्त्र्य ही माया है। यह अत्यन्त दुर्घट है।१ लोकमें भी योगी लोग तथा दूसरे मान्त्रिक आदि थोड़ा-सा संकुचित सामर्थ्य पाकर किसी युक्तिसे न होनेवाली बातें करके दिखा ही देते हैं। अतः पराचितिके लिये यह कोई विचित्र बात नहीं है ॥ ८४-८५ ॥ परशुरामजी ! इस प्रकार पराचितिके निर्मल स्वातन्त्र्यके कारण अपना ही स्वरूप अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न होकर भासने लगा है ॥८६॥ अभिमानका किसी एक देशमें टिक जाना ही 'परिच्छेद' है। वही अपूर्णत्वबुद्धि भी है, जिसे 'अविद्या' नामसे कहा जाता है ॥८७॥ अपने आत्माका अनुसन्धान न करने तथा बाह्य दृष्टिसे स्थित रहनेके कारण इस विषयमें अनेकों तार्किकों और पण्डितोंको भी भ्रम हो जाता है ॥ ८८ ॥ १. अर्थात् असम्भव बातोंको भी सम्भव कर देनेवाला है।

२७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे गुरूपदिष्टं यत् किञ्चित् सद्वाप्यसदपीतरत् । अनुदाहृत्य चात्मानं यावन्न ह्यवलोकयेत् ॥ ८९ ॥ तावन्न फलमाप्नोति परोक्षात्मतया श्रुतेः । अतो मयोक्तं राम त्वं सम्पश्यात्मनि सद्द्दशा ॥ ९० ॥ चितिर्या परमा देवी सर्वसामान्यरूपिणी । सा प्रकाशमयी यस्माज्जडव्यावृत्तरूपिणी ॥ ९१ ॥ अतः स्वात्मनि विश्रान्तिस्त्वहन्ता पररूपिणी । जडाश्चिदात्मविश्रान्ताश्चिदात्मनि विभासतः ॥ ९२ ॥ न स्वरूपे स्वतो भान्ति तस्मान्न स्वात्मविश्रमः । चितेस्तु केवलं स्वस्मिन्ननन्यापेक्षया सदा ॥ ९३ ॥ भासमानत्वतः स्वस्मिन् विश्रान्तिरूपपद्यते । पूर्णाहन्ता परा सेयं या जडेषु न विद्यते ॥ ९४ ॥ गुरुदेवने सत् , असत् अथवा किसी अन्यरूपसे जो कुछ बतलाया है उसे जबतक आत्मानुसंधान करते हुए नहीं देखा जायगा तबतक केवल परोक्षरूपसे सुन लेनेसे ही मोक्ष रूप फलकी प्राप्ति नहीं होगी । इसलिये परशुराम ! मैंने जो कुछ कहा है उसे तुम अन्तर्मुखी दृष्टिसे अच्छीतरह अनुभव करो ॥ ८९-६० ॥ सम्पूर्ण पदार्थोंके विशेष अंशोंको त्यागकर उनमें सामान्यरूपसे भासनेवाली परमा देवी जो चिति है वही प्रकाशस्वरूपा है क्योंकि उसके स्वरूपमें जडताका सर्वथा निषेध है ॥ ६१ ॥ अतः वह स्वस्वरूपमें विश्रान्तिस्वरूपा है तथा पराहन्तारूपिणी है । जड पदार्थ उस चित्स्वरूपमें ही विश्रान्त हैं, चिदात्माके आश्रयसे ही उनका भान होता है ॥ ६२ ॥ वे अपने स्वरूपमें स्वयं प्रकाशित नहीं होते, इसलिये उनकी अपनेमें ही विश्रान्ति ( स्थिति ) नहीं है । केवल शुद्ध चितिकी ही अपनेमें विश्रान्ति होनी सम्भव है, क्योंकि वह किसी अन्यकी अपेक्षा न करके सर्वदा अपने स्वरूपमें ही प्रकाशमान है । यही श्रेष्ठ पूर्णा- हन्ता है, जो कि जड पदार्थोंमें नहीं है ॥ ६३-६४ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७५ व्यावृत्तिः स्पर्शहीनेयं परिच्छेदविवर्जनात् । सर्वमस्यां यतः संस्थमादर्शे नगरं यथा ॥ ९५ ॥ व्यावृत्तिर्वा परिच्छेदः कथं केन हि सम्भवेत् । एवं पूर्णस्वरूपायाः पूर्णं यत्स्फुरणं स्थितम् ॥ ९६ ॥ तदेव स्वात्मविश्रान्तिः पूर्णाहन्ता च कथ्यते । अखण्डैकरसं ह्येतदेतावद्राम वै भवेत् ॥ ९७ ॥ निरूपणे बहुविधमिव तत् प्रतिभासते । एतावदेव स्वातन्त्र्यं यतः शक्तिर्हि तन्मयी ॥ ९८ ॥ प्रकाशस्तेजसो यद्वदौष्ण्यं चैवापृथक् स्थितम् । एवं स्वातन्त्र्यविश्रान्तिसहितैकरसात्मिका ॥ ९९ ॥ इयमेव हि मायाख्या शक्तिः परमदुर्धटा । आदर्शवद्यत्स्वरूपे चिदेकरसरूपिणी ॥ १०० ॥

[ इसमें अन्य सभीका अभाव है ] इसलिये यह व्यावृत्ति सब प्रकारके परिच्छेदसे शून्य होनेके कारण भेदके स्पर्शमें रहित है; क्योंकि दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान सब कुछ इसीमें भास रहा है ॥ ९५ ॥ फिर इसकी व्यावृत्ति या परिच्छेद किसीके द्वारा कैसे हो सकते हैं । इस प्रकार इस पूर्णस्वरूपाका जो पूर्णरूपसे स्फुरित होना है वही स्वात्मविश्रान्ति या पूर्णाहन्ता कही जाती है । परशुराम ! ऐसी यह चिति सचमुच अखण्ड एकरस ही है ॥ ९६-९७ ॥ केवल निरूपण ( चर्चा ) के समय ही वह अनेक रूप-सी भास- ने लगती है । यही उसका स्वातन्त्र्य है और वास्तवमें वो उसका वह परमस्वातन्त्र्यरूप सामर्थ्य भी तद्रूप ही है, [ उससे भिन्न नहीं ] ॥ ९८ ॥ जिस प्रकार अग्निमें प्रकाश और उष्णता उससे अभिन्न ही रहते हैं उसी प्रकार इन स्वातन्त्र्य और विश्रान्तिके सहित वह एक- रसरूपा ही है ॥ ९९ ॥ यही असम्भवको भी सम्भव कर देनेवाली माया नामकी शक्ति है, जो दर्पणकी तरह अपने स्वरूपमें एकरस चित्स्वरूपिणी रहते हुए

२७६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे

सत्यप्यनेकवैचित्र्याभासनेन विभासते । तथा भासनकालेऽपि स्वरूपादनिवर्त्तनम् ॥ १०१ ॥ परिच्छेदावभासो यः सोऽनात्माभास उच्यते । साऽविद्या जडशक्तिः सा शून्यं प्रकृतिरेव च ॥ १०२ ॥ अत्यन्ताभाव आकाशस्तमः प्रथमसर्गकः । सर्वं तदेव संप्रोक्तं परिच्छेदनमादिमम् ॥ १०३ ॥ राम यः परिपूर्णात्मा विश्रमो वै समास्थितः । तस्यैकदेशताभ्रान्तिकृतमाकाशभासनम् ॥ १०४ ॥ अत आत्मप्रदेशो य आत्माभिमतिवर्जितः । आकाशः स हि सम्प्रोक्तः स हि संसारकारणम् ॥ १०५ ॥ एष एव भवेद्भेदः पशुदृष्ट्यैकगोचरः । राम सूक्ष्मदृशा पश्य य आकाशस्त्वयेक्ष्यते ॥ १०६ ॥ तत्रत्यजीवराशीनामात्मा चैतन्यमेव सः । यथान्यदेहेष्वाकाशो भासते यः सदा तव ॥ १०७ ॥


ही अनेकों विचित्र आभासोंके रूपमें भासने लगती है। और इस प्रकार भासनेके समय भी अपने स्वरूपसे च्युत नहीं होती ॥१००-१०१॥ इसमें जो परिच्छेदोंकी प्रतीति होती है वही अनात्माभास कही जाती है। तथा वही अविद्या, जडशक्ति, शून्य और प्रकृति भी कहलाती है ॥ १०२ ॥ उसका वह प्रथम परिच्छेद ही अत्यन्ताभाव, आकाश, तप और प्रथम सर्ग कहा जाता है ॥ १०३ ॥ परशुराम ! इसकी जो पूर्णाहन्तारूप विश्रान्ति है उसीमें एक- देशताकी भ्रान्ति होनेसे आकाशका भान होने लगता है ॥ १०४ ॥ अतः आत्माका जो प्रदेश आत्माभिमान (अहंभाव) से रहित है वही आकाश कहा जाता है और वही संसारका कारण है ॥ १०५ ॥ यह आकाश ही अज्ञानियोंकी दृष्टिसे दिखायी देनेवाला भेद है। [और भेद ही संसारका मूल है, इसीसे इसे संसारका कारण कहा है।] परशुराम ! तुम सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो। तुम जो आकाश देखते हो वही तो उसमें रहनेवाले जीवसमूहका चैतन्य आत्मा है ॥ १०६-१०७ पू० ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २७७ स एव तेषामात्मा स्याच्चिदानन्दघनात्मकः । एवं स्वकल्पिताकाशग्रस्तं यच्चिद्वपुः स्थितम् ॥ १०८ ॥ तदेव मन इत्युक्तमात्मैव न हि चेतरत् । तत्रावरणमुख्यत्वात् प्रमाणं मन उच्यते ॥ १०९ ॥ आवृतप्राधान्यतस्तु प्रमाता जीव उच्यते । एवमाकाशावृतोऽपि चिदात्मा भूय एव तु ॥ ११० ॥ आकाशे कोमलेऽत्यन्तशिथिले निर्घनेऽमले । कठिनश्लिष्टघनतामालिन्यानां प्रकल्पजैः ॥ १११ ॥ भूतान्याभास्य देहात्मा देहेनापि समावृतः । कुम्भोदरगतो दीप उदरं व्याप्य भासते ॥ ११२ ॥ एवमेष शरीरान्तरवभासनमात्रकः । आस्ते गूढप्रदीपात्मा तदन्तर्मात्रभासनः ॥ ११३ ॥ जिस प्रकार दूसरोंके शरीरोंमें जो आकाश प्रतीत होता है वही उनका चिदानन्दघनस्वरूप आत्मा है और वही सर्वदा तुम्हारा भी आत्मा है ॥ १०७ उ०-१०८ पू० ॥ इस प्रकार जो चैतन्यस्वरूप हमारे कल्पित आकाशसे व्याप्त है वही 'मन' कहा गया है और वही आत्मा भी है, कोई अन्य नहीं ॥ १०८ उ०-१०९ पू० ॥ आवरण करनेवाली जडशक्तिकी प्रधानतासे उसे प्रमाणरूप मन कहते हैं और आवृत होनेवाली चित्शक्तिके प्राधान्यसे वही प्रमाता जीव कहा जाता है ॥ १०९ उ०-११० पू० ॥ इस प्रकार आकाशसे आवृत हुआ भी चिदात्मा फिर पञ्चभूतोंसे आवृत हो जाता है । आकाश अत्यन्त कोमल, शिथिल, विरल और निर्मल है; किन्तु उसमें कठिनता, संश्लेष, सघनता और मलिनता- की कल्पनासे पञ्चभूत प्रकट हो जाते हैं । इस प्रकार देहसे आवृत होकर यह देहात्मा घड़ेके भीतर रखे हुए दीपककी तरह शरीरके भीतर व्याप्त होकर प्रकाशित होने लगता है ॥ ११० उ०-११२ ॥ इस प्रकार यह आत्मा शरीरके भीतरी भागको ही प्रकाशित करता है, जैसे घड़ेके भीतर रखा हुआ दीपक उसके भीतरी भागको प्रकाशित किया करता है ॥ ११३ ॥

२७८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे दीपप्रभा घटच्छिद्राद्यथा निर्याति वै बहिः । एवमक्षद्वारमुखाद् भूयो निर्याति वै चितिः ॥ ११४ ॥ निर्याणं तु चितेर्नास्ति पूर्णत्वादक्रियत्वतः । स्वात्मावरणमाकाशं स्फूत्तिंशक्तिश्चिदात्मनः ॥ ११५ ॥ यावन्निवारयेत्तावन्निर्याणं प्रतिभासते । मनोव्यापार एष स्यात् स्फूर्त्त्यापहतिरावृतेः ॥ ११६ ॥ तस्माद्राम मनो नान्यदात्मैव मन उच्यते । चला चितिर्मनोनाम्नी निश्चलात्मस्वरूपिणी ॥ ११७ ॥ आवृत्त्यमिहतिः स्फूर्त्या चलनं राम वै चितेः । एतदेव विकल्पः स्याद्विकल्पपरिवर्जने ॥ ११८ ॥ निर्विकल्पं पूर्णरूपं विज्ञानं मुक्तिनामकम् । राम त्यजात्र सन्देहं विकल्पस्य विवर्जने ॥ ११९ ॥ अप्यावरणदोषः स्यादिति नास्त्येव चावृतिः । आवृतिर्न हि सत्यास्ति यतः स्वेनैव कल्पिता ॥ १२० ॥ जिस प्रकार घड़ेके छिद्रोंमें होकर दीपकका प्रकाश बाहर निकलता रहता है, उसी प्रकार फिर यह चिदात्मा इन्द्रियद्वारोंसे होकर बाहर निकलने लगता है ॥ ११४ ॥ चेतन पूर्ण और अक्रिय है, इसलिये उसका कहीं आना-जाना नहीं हो सकता । किन्तु जब चिदात्माकी चेतनशक्ति अपने आवरण आकाश- को अलग करती है तो उसका निकलना भासने लगता है । चेतनके द्वारा यह आवरणकी निवृत्ति ही मनका व्यापार है ॥ ११५-११६ ॥ इसलिये परशुराम ! मन कोई अन्य पदार्थ नहीं है, आत्मा ही मन कहा जाता है । चलायमान चेतनका नाम मन है और निश्चल चेतन आत्मस्वरूप है ॥ ११७ ॥ चितिशक्तिके स्फुरणद्वारा आवरणका हटना ही चेतनका चलन है । यही विकल्प है । विकल्पका त्याग होनेपर जो निर्विकल्प पूर्ण विज्ञान रहता है उसीका नाम मुक्ति है ॥ ११८-११९ पू० ॥ परशुराम ! तुम यह सन्देह त्याग दो कि विकल्पका त्याग होनेपर भी आवरणदोष फिर हो सकता है; क्योंकि आवरण तो है ही नहीं

अष्टादशोऽध्यायः। २७६

यथा मनोरथे बद्धः केन चिच्छत्रुणा स्वयम् । ताड्यमानस्तर्ज्यमानो यावत् सङ्कल्पवर्जनम् ॥ १२१ ॥ कुर्यात्तावत्ताडनं वा तर्जनं वापि लीयते । किं तत्र शिष्यते बन्धस्तथात्रापि विभावय ॥ १२२ ॥ अनादिकालाद्रामात्र बन्धो नास्त्येव कस्यचित् । जडात्मभ्रान्तिमुत्सृज्य कोऽयं बन्धो विचारय ॥ १२३ ॥ एष एव महाबन्धो बन्धसत्यत्वनिश्चयः । मृषा भीतस्य बालस्य यक्षग्रह इव स्थितः ॥ १२४ ॥ यावद्वन्धभ्रान्तिमेनां नोत्सृजेद् बुद्धिमानपि । न तावत् संसृतेर्मुक्तो भवेत् क्वापि महोद्यमैः ॥ १२५ ॥ कोऽयं बन्धः कथं वा स्यान्निर्मलस्य चिदात्मनः । प्रतिबिम्बात्मकैः स्वात्मादर्शान्तःप्रविभावितैः ॥ १२६ ॥ बन्धो यदि तदादर्शप्रतिबिम्बाग्निरादहेत् । आवरण वास्तविक नहीं है, क्योंकि वह तो अपना ही कल्पना किया हुआ है ॥ ११६ उ०-१२० ॥ जिस प्रकार कोई मनोराज्य करे कि उसे किसी शत्रुने बाँध लिया है, वह मारता है और धमका रहा है। किन्तु जैसे ही वह उस संकल्पको त्यागता है उसके वे ताडन और तर्जन भी लीन हो जाते हैं। क्या वहाँ कोई बन्धन बच रहता है ? वैसी ही बात यहाँ समझो ॥ १२१-१२२ ॥ परशुराम ! इस संसारमें अनादिकालसे किसीका कोई बन्धन नहीं है। इस जडस्वरूपा भ्रान्तिको त्यागकर विचार करो कि वास्तवमें बन्धन है क्या ? ॥ १२३ ॥ बन्धनकी सत्यता समझना—यही सबसे बड़ा बन्धन है। वह झूठमूठ हौआसे डरे हुए बालकके भयके समान बना हुआ है ॥ १२४ ॥ बुद्धिमान् पुरुष भी जबतक इस भ्रान्तिको नहीं त्यागेगा, तब तक महान् प्रयत्न करनेपर भी वह संसारसे कभी मुक्त नहीं होगा ॥ १२५ ॥ यह बन्धन है क्या ! निर्मल चिदात्माको यह हो भी कैसे सकता है ? यदि अपने आत्मारूप दर्पणमें भासनेवाले प्रतिबिम्बात्मक पदार्थोंसे इसे बन्धन हो सकता है तब तो दर्पणके प्रतिबिम्बमें प्रतीत होनेवाले

२८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे बन्धस्य सत्यताबुद्धिर्मनसोऽस्तित्वनिश्चयः ॥ १२७ ॥ एतद्द्वयमृते नास्ति बन्धः कस्यापि कुत्रचित् । यावदेतद्द्वयमलं सद्विचारमहाजलैः ॥ १२८ ॥ नोन्मार्जितं तावदिह तस्य संसारनाशनम् । अहं वा ब्रह्मदेवो वा विष्णुर्वापि च शङ्करः ॥ १२९ ॥ विद्यात्मिका वा त्रिपुरा नैव शक्ताः कथञ्चन । तस्माद्राम द्वयञ्चैतत् परित्यज्य सुखी भव ॥ १३० ॥ तस्माद्राम निर्विकल्परूपे मनसि संस्थिते । आत्ममात्रत्वतस्तस्य द्वैतं न परिशिष्यते ॥ १३१ ॥ इदं तदितिरूपेण भासनान्यन्मनो नहि । इदमादिपरित्यागे मनसात्मैव शिष्यते ॥ १३२ ॥ रज्जुसर्पपरिभ्रान्तिः सत्याभिमतवस्तुनि । रज्जुरूपे हि सर्पस्य भासिनीति विनिश्चयः ॥ १३३ ॥ अग्निसे भी पदार्थोंका दाह हो जाना चाहिये ॥ १२६-१२७ पू० ॥ ‘बन्धनको सत्य समझना’ और ‘मनकी सत्ता स्वीकार करना’ इन दो को छोड़कर कहीं किसीके लिये और कोई बन्धन नहीं है ॥ १२७ उ०-१२८ पू० ॥ जबतक सद्विचाररूप महान् जलसे इन दो मलोंका मार्जन नहीं होगा तबतक मैं, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर अथवा विद्यास्वरूपिणी स्वयं देवी त्रिपुरा भी किसी प्रकार उसके संसार की निवृत्ति नहीं कर सकते। इसलिये परशुराम ! तुम इन दोनोंको त्यागकर सुखी हो जाओ ॥ १२८ उ०-१३० ॥ अतः परशुराम ! यद्यपि समाधिमें निर्विकल्परूपमें मन रहता है, तथापि उस समय वह आत्ममात्र ही तो है, इसलिये द्वैत नहीं रहता॥१३१॥ ‘यह’ ‘वह’ इत्यादि रूपसे भासनेके सिवा मन और कुछ नहीं है। जब मनसे ‘यह’ ‘वह’ इत्यादिका त्याग हो गया तब तो आत्मा ही रह जाता है ॥ १३२ ॥ रज्जुमें भासित होनेवाली सर्पकी भ्रान्ति व्यवहारमें सत्य मानी हुई वस्तुमें होती है। अतः उसके विषयमें यह निश्चय होता है कि यह रज्जुके रूपमें सर्पकी प्रतीति कराने वाली है ॥ १३३ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २८१ तत्र सर्पस्य बाधोऽपि रज्ज्वालम्बनहेतुतः। चिद्रूपादात्मनोऽन्यत्तु रज्जुज्ञानं स्थितं भवेत् ॥ १३४ ॥ सापि रज्जुस्थिति यदा स्वप्नदृष्टान्तकल्पिता। रज्जुबाधे हि तज्ज्ञानं कथं शिष्येत् किमाश्रयम् ॥ १३५ ॥ तस्माद् दृश्यस्य बाधे तु तज्ज्ञानं केवला हि दृक्। चिदात्मानतिरिक्तत्वाद् द्वैतं तेन कथं भवेत् ॥ १३६ ॥ अर्थक्रिया हि संदृष्टा स्वप्नवस्तुषु सुस्थिरा। स्वाप्नवस्तु स्थिरमिति स्वप्ने सर्वैर्विभावितम् ॥ १३७ ॥ एतावानेव भेदः स्यात् स्वप्नजाग्रद्विभासयोः। जाग्रति स्वप्नमिथ्यात्वनिश्चयो भवति ध्रुवम् ॥ १३८ ॥ स्वप्ने न जायते जाग्रन्मिथ्यात्वस्य विनिर्णयः। नैतावतैव सत्यत्वं जाग्रद्व्यवहृतेर्भवेत् ॥ १३९ ॥ उसमें सर्पका तो बाध हो जाता है, क्योंकि उसका आलम्बन तो रज्जु ही होती है। किन्तु उस समय भी चिद्रूप आत्मासे रज्जुका ज्ञान भिन्न ही रहता है, [ उसका बाध नहीं होता ] ॥ १३४ ॥ पर जब स्वप्नके दृष्टान्तसे वह रज्जु भी चेतनमें कल्पित मानी जाय, तब रज्जुका बाध होनेपर उसका ज्ञान किस प्रकार और किसके आश्रयसे शेष रहेगा ? ॥ १३५ ॥ अतः दृश्य जगत्का बाध होनेपर उसका ज्ञान केवल चिन्मात्र ही रहता है। वह चिदात्मासे भिन्न है ही नहीं, फिर द्वैत कैसे रह सकता है ? ॥ १३६ ॥ [ यदि कार्यका निर्वाह करनेवाली और स्थिर जान पड़नेके कारण व्यावहारिक वस्तुओंको सत्य मानो, तब तो ] स्वप्नकी वस्तुओंमें भी स्थिर कार्यनिर्वाहकता देखी जाती है। स्वप्नमें स्वप्नके पदार्थ भी सबको स्थिर ही जान पड़ते हैं ॥ १३७ ॥ स्वप्न और जाग्रत्की प्रतीतियोंमें केवल इतना ही भेद है कि जाग्रत्कालमें स्वप्नका मिथ्यात्व-निश्चय तो अवश्य हो जाता है, किन्तु स्वप्नमें जाग्रत्का मिथ्यात्व निश्चय नहीं होता। इतनेसे ही जाग्रत्कालके व्यवहारकी सत्यता तो सिद्ध हो नहीं सकती ॥१३८-१३९॥

२८२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यथा जाग्रति वस्तूनां स्थिरतार्थक्रियापि च । दृश्यते किं तथा स्वप्ने दृश्यते न हि वा वद ॥ १४० ॥ न स्वप्ने जागरा भावाः स्वाप्ना वा नैव जागरे । अर्थक्रियाकरा वापि स्थिरा वा भान्ति तत्समम् ॥ १४१ ॥ विभावय सूक्ष्मदृशा को भेदोऽतीतस्वप्नयोः । पश्यैन्द्रजालिककृते स्थैर्यमर्थक्रियामपि ॥ १४२ ॥ किं तावतैव तत् सत्यमैन्द्रजालिकनिर्मितम् । सत्यासत्यविभागो वै प्राकृतैर्विदितो न हि ॥ १४३ ॥ अतएव मोहितास्ते प्रोचुः सत्यं हि जागतम् । कदाप्यभावसंस्पृष्टं सत्यं राम प्रचक्षते ॥ १४४ ॥ अभावः स्यादभानाद्वै त्वभानं न चितेः क्वचित् । अभानमचितामस्ति ह्यनेकत्वावभासतः ॥ १४५ ॥ जाग्रत्कालमें जिस प्रकार वस्तुओंकी स्थिरता और कार्यनिर्वाहकता देखी जाती है, बताओ, क्या स्वप्नमें स्वप्नके पदार्थोंकी वैसी नहीं देखी जाती ? ॥ १४० ॥ हाँ, स्वप्नमें जाग्रत्के पदार्थ और जाग्रत्में स्वप्नके पदार्थ न तो कार्यनिर्वाहक जान पड़ते हैं और न स्थिर ही। सो, यह बात दोनों अवस्थाओंमें समान ही है ॥ १४१ ॥ तुम सूक्ष्मदृष्टिसे विचार करो कि जाग्रत्की बीती हुई घटनाओंमें और स्वप्नमें क्या भेद है ? देखो, जाग्रदवस्थामें ऐन्द्रजालिककी बनायी हुई वस्तुओंमें स्थिरता भी रहती है और कार्यनिर्वाहकता भी । तो क्या इतनेसं ही उसकी बनायी हुई वे वस्तुएँ सत्य हो जाती हैं ? ॥ १४२-१४३ पू० ॥ यह सत्य और असत्यका भेद साधारण पुरुषोंको मालूम नहीं है । इसीसे वे मोहवश कहते हैं कि जगत्के पदार्थ सत्य हैं ॥ १४३ उ०-१४४ पू० ॥ परशुराम ! सत्य तो वह है जिसे कभी अभावका स्पर्श नहीं होता । और अभाव तब होता है जब भान न हो । तो चितिका अभाव कभी नहीं होता । और अभाव तो अचेतन दृश्य पदार्थोंका ही होता है, क्योंकि उनमें अनेकता भासती है ॥ १४४ उ०--१४५ ॥

अष्टादशोऽध्यायः। २८३ परस्पराभावभासा अचिद्भावा हि सर्वथा। चिद्भानं कदा कुत्र स्याद्राम प्रविचारय ॥ १४६ ॥ यदा चितिर्न भायाद्वै तदा भायात् कथं वद। न भायाद्वा कथं भायादभाने यदि तद्द्वयोः ॥ १४७ ॥ राम भायादेव चितिस्तस्मात् सत्यैव सा चितिः। राम सत्यासत्यभेदं शृणु संक्षेपतो ब्रुवे ॥ १४८ ॥ अन्यानपेक्षभासं स्यात् सत्यमन्यदसत्यकम् । अन्यथा रज्जुसर्पाद्यमपि सत्यं भवेन्ननु ॥ १४९ ॥ बाधो ह्यभावविज्ञानं तद्भावेऽपि हि सम्भवेत् । दृश्य पदार्थ सर्वथा अन्योन्याभावपूर्वक¹ ही भासते हैं। किन्तु परशुराम ! विचार तो करो—भला, चेतनका अभाव कब और कहाँ हो सकता है ? ॥ १४६ ॥ जब चेतनका भान न होगा तब उस 'तब' ( काल ) का भी भान कैसे होगा ? यदि कहो कि नहीं होगा, तो उन काल और चेतन दोनोंका अभान होनेपर उस अभानका भी भान कैसे होगा ? [ क्योंकि काल और चेतनके अभानका भान भी तो चेतनके ही प्रकाशमें हो सकता है । ] ॥ १४७ ॥ अतः परशुराम ! चेतन तो भासता ही रहता है, इसलिये वही सत्य है । राम ! सत्य और असत्यका भेद संक्षेपसे सुनो, मैं बताता हूँ ॥ १४८ ॥ जो दूसरेकी अपेक्षाके बिना भासे वह सत्य, अन्य सब असत्य । नहीं तो रज्जुमें कल्पित सर्पादि भी सत्य मानने होंगे² ॥ १४९ ॥ [ यदि बाध और अबाधको ही सत्यासत्यका निर्णय करनेमें हेतु मानें तो— ] 'बाध' कहते हैं अभावानुभूति को । यह भावमें भी हो १. जैसे घट और पट दो भिन्न पदार्थ हैं, इनका भान परस्पर एक-दूसरेके अभावपूर्वक ही होगा । अर्थात् घटाभावके बिना पटका और पटाभावके बिना घटका भान नहीं हो सकता । २. यदि सत्य और असत्यका ऐसा लक्षण न करके यह मानें कि जिसका बाध या अभाव हो जाय वह असत्य और जिसका बाध या अभाव न हो वह सत्य— तो प्रतीतिकालमें तो रज्जुमें कल्पित सर्पका भी न अभाव होता है और न बाध, इसलिये उसे भी सत्य ही मानना होगा । अतः सबसे निर्दोष लक्षण वही है जो यहाँ किया गया है ।