भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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अष्टादशोऽध्यायः। २७६

यथा मनोरथे बद्धः केन चिच्छत्रुणा स्वयम् । ताड्यमानस्तर्ज्यमानो यावत् सङ्कल्पवर्जनम् ॥ १२१ ॥ कुर्यात्तावत्ताडनं वा तर्जनं वापि लीयते । किं तत्र शिष्यते बन्धस्तथात्रापि विभावय ॥ १२२ ॥ अनादिकालाद्रामात्र बन्धो नास्त्येव कस्यचित् । जडात्मभ्रान्तिमुत्सृज्य कोऽयं बन्धो विचारय ॥ १२३ ॥ एष एव महाबन्धो बन्धसत्यत्वनिश्चयः । मृषा भीतस्य बालस्य यक्षग्रह इव स्थितः ॥ १२४ ॥ यावद्वन्धभ्रान्तिमेनां नोत्सृजेद् बुद्धिमानपि । न तावत् संसृतेर्मुक्तो भवेत् क्वापि महोद्यमैः ॥ १२५ ॥ कोऽयं बन्धः कथं वा स्यान्निर्मलस्य चिदात्मनः । प्रतिबिम्बात्मकैः स्वात्मादर्शान्तःप्रविभावितैः ॥ १२६ ॥ बन्धो यदि तदादर्शप्रतिबिम्बाग्निरादहेत् । आवरण वास्तविक नहीं है, क्योंकि वह तो अपना ही कल्पना किया हुआ है ॥ ११६ उ०-१२० ॥ जिस प्रकार कोई मनोराज्य करे कि उसे किसी शत्रुने बाँध लिया है, वह मारता है और धमका रहा है। किन्तु जैसे ही वह उस संकल्पको त्यागता है उसके वे ताडन और तर्जन भी लीन हो जाते हैं। क्या वहाँ कोई बन्धन बच रहता है ? वैसी ही बात यहाँ समझो ॥ १२१-१२२ ॥ परशुराम ! इस संसारमें अनादिकालसे किसीका कोई बन्धन नहीं है। इस जडस्वरूपा भ्रान्तिको त्यागकर विचार करो कि वास्तवमें बन्धन है क्या ? ॥ १२३ ॥ बन्धनकी सत्यता समझना—यही सबसे बड़ा बन्धन है। वह झूठमूठ हौआसे डरे हुए बालकके भयके समान बना हुआ है ॥ १२४ ॥ बुद्धिमान् पुरुष भी जबतक इस भ्रान्तिको नहीं त्यागेगा, तब तक महान् प्रयत्न करनेपर भी वह संसारसे कभी मुक्त नहीं होगा ॥ १२५ ॥ यह बन्धन है क्या ! निर्मल चिदात्माको यह हो भी कैसे सकता है ? यदि अपने आत्मारूप दर्पणमें भासनेवाले प्रतिबिम्बात्मक पदार्थोंसे इसे बन्धन हो सकता है तब तो दर्पणके प्रतिबिम्बमें प्रतीत होनेवाले