त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे बन्धस्य सत्यताबुद्धिर्मनसोऽस्तित्वनिश्चयः ॥ १२७ ॥ एतद्द्वयमृते नास्ति बन्धः कस्यापि कुत्रचित् । यावदेतद्द्वयमलं सद्विचारमहाजलैः ॥ १२८ ॥ नोन्मार्जितं तावदिह तस्य संसारनाशनम् । अहं वा ब्रह्मदेवो वा विष्णुर्वापि च शङ्करः ॥ १२९ ॥ विद्यात्मिका वा त्रिपुरा नैव शक्ताः कथञ्चन । तस्माद्राम द्वयञ्चैतत् परित्यज्य सुखी भव ॥ १३० ॥ तस्माद्राम निर्विकल्परूपे मनसि संस्थिते । आत्ममात्रत्वतस्तस्य द्वैतं न परिशिष्यते ॥ १३१ ॥ इदं तदितिरूपेण भासनान्यन्मनो नहि । इदमादिपरित्यागे मनसात्मैव शिष्यते ॥ १३२ ॥ रज्जुसर्पपरिभ्रान्तिः सत्याभिमतवस्तुनि । रज्जुरूपे हि सर्पस्य भासिनीति विनिश्चयः ॥ १३३ ॥ अग्निसे भी पदार्थोंका दाह हो जाना चाहिये ॥ १२६-१२७ पू० ॥ ‘बन्धनको सत्य समझना’ और ‘मनकी सत्ता स्वीकार करना’ इन दो को छोड़कर कहीं किसीके लिये और कोई बन्धन नहीं है ॥ १२७ उ०-१२८ पू० ॥ जबतक सद्विचाररूप महान् जलसे इन दो मलोंका मार्जन नहीं होगा तबतक मैं, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर अथवा विद्यास्वरूपिणी स्वयं देवी त्रिपुरा भी किसी प्रकार उसके संसार की निवृत्ति नहीं कर सकते। इसलिये परशुराम ! तुम इन दोनोंको त्यागकर सुखी हो जाओ ॥ १२८ उ०-१३० ॥ अतः परशुराम ! यद्यपि समाधिमें निर्विकल्परूपमें मन रहता है, तथापि उस समय वह आत्ममात्र ही तो है, इसलिये द्वैत नहीं रहता॥१३१॥ ‘यह’ ‘वह’ इत्यादि रूपसे भासनेके सिवा मन और कुछ नहीं है। जब मनसे ‘यह’ ‘वह’ इत्यादिका त्याग हो गया तब तो आत्मा ही रह जाता है ॥ १३२ ॥ रज्जुमें भासित होनेवाली सर्पकी भ्रान्ति व्यवहारमें सत्य मानी हुई वस्तुमें होती है। अतः उसके विषयमें यह निश्चय होता है कि यह रज्जुके रूपमें सर्पकी प्रतीति कराने वाली है ॥ १३३ ॥