भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

अष्टादशोऽध्यायः। २८१ तत्र सर्पस्य बाधोऽपि रज्ज्वालम्बनहेतुतः। चिद्रूपादात्मनोऽन्यत्तु रज्जुज्ञानं स्थितं भवेत् ॥ १३४ ॥ सापि रज्जुस्थिति यदा स्वप्नदृष्टान्तकल्पिता। रज्जुबाधे हि तज्ज्ञानं कथं शिष्येत् किमाश्रयम् ॥ १३५ ॥ तस्माद् दृश्यस्य बाधे तु तज्ज्ञानं केवला हि दृक्। चिदात्मानतिरिक्तत्वाद् द्वैतं तेन कथं भवेत् ॥ १३६ ॥ अर्थक्रिया हि संदृष्टा स्वप्नवस्तुषु सुस्थिरा। स्वाप्नवस्तु स्थिरमिति स्वप्ने सर्वैर्विभावितम् ॥ १३७ ॥ एतावानेव भेदः स्यात् स्वप्नजाग्रद्विभासयोः। जाग्रति स्वप्नमिथ्यात्वनिश्चयो भवति ध्रुवम् ॥ १३८ ॥ स्वप्ने न जायते जाग्रन्मिथ्यात्वस्य विनिर्णयः। नैतावतैव सत्यत्वं जाग्रद्व्यवहृतेर्भवेत् ॥ १३९ ॥ उसमें सर्पका तो बाध हो जाता है, क्योंकि उसका आलम्बन तो रज्जु ही होती है। किन्तु उस समय भी चिद्रूप आत्मासे रज्जुका ज्ञान भिन्न ही रहता है, [ उसका बाध नहीं होता ] ॥ १३४ ॥ पर जब स्वप्नके दृष्टान्तसे वह रज्जु भी चेतनमें कल्पित मानी जाय, तब रज्जुका बाध होनेपर उसका ज्ञान किस प्रकार और किसके आश्रयसे शेष रहेगा ? ॥ १३५ ॥ अतः दृश्य जगत्का बाध होनेपर उसका ज्ञान केवल चिन्मात्र ही रहता है। वह चिदात्मासे भिन्न है ही नहीं, फिर द्वैत कैसे रह सकता है ? ॥ १३६ ॥ [ यदि कार्यका निर्वाह करनेवाली और स्थिर जान पड़नेके कारण व्यावहारिक वस्तुओंको सत्य मानो, तब तो ] स्वप्नकी वस्तुओंमें भी स्थिर कार्यनिर्वाहकता देखी जाती है। स्वप्नमें स्वप्नके पदार्थ भी सबको स्थिर ही जान पड़ते हैं ॥ १३७ ॥ स्वप्न और जाग्रत्की प्रतीतियोंमें केवल इतना ही भेद है कि जाग्रत्कालमें स्वप्नका मिथ्यात्व-निश्चय तो अवश्य हो जाता है, किन्तु स्वप्नमें जाग्रत्का मिथ्यात्व निश्चय नहीं होता। इतनेसे ही जाग्रत्कालके व्यवहारकी सत्यता तो सिद्ध हो नहीं सकती ॥१३८-१३९॥