भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 404 में से

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अष्टादशोऽध्यायः। २७३ मायावरणमप्येतत् परिच्छिन्नदृशो भवेत् । यथैन्द्रजालिको मायावृतश्चान्यदृशो भवेत् ॥ ८३ ॥ मायापरचितोऽत्यन्तं स्वातन्त्र्यमतिदुर्धटम् । लोकेऽपि योगिनोऽन्ये च मान्त्रिका ऐन्द्रजालिकाः॥ ८४ ॥ आच्छादितं स्वस्वातन्त्र्यं प्राप्य किञ्चित् सुयुक्तितः। दुर्घटं घटयन्त्येव ततो नैतद्विचित्रितम् ॥ ८५ ॥ एवं परचितेः स्वच्छस्वातन्त्र्यात् स्वात्मनो वपुः। अनेकधा परिच्छिन्नं भासितं भृगुनन्दन ॥ ८६ ॥ परिच्छेदोऽभिमानस्य त्वेकदेशे सुविश्रमः। साऽप्यपूर्णत्वविख्यातिर्याऽविद्या परिगीयते ॥ ८७ ॥ अत्र मुह्यन्ति बहवस्तार्किकाः पण्डिता अपि । स्वात्मानमनुदाहृत्य बहिर्दृष्टितया स्थितेः ॥ ८८ ॥ उसका यह मायारूप आवरण भी परिच्छिन्न दृष्टिवालोंके लिये ही है, जैसे ऐन्द्रजालिक दूसरोंकी दृष्टिमें ही मायासे आवृत्त होता है ॥ ८३ ॥ पराचितिका परमस्वातन्त्र्य ही माया है। यह अत्यन्त दुर्घट है।१ लोकमें भी योगी लोग तथा दूसरे मान्त्रिक आदि थोड़ा-सा संकुचित सामर्थ्य पाकर किसी युक्तिसे न होनेवाली बातें करके दिखा ही देते हैं। अतः पराचितिके लिये यह कोई विचित्र बात नहीं है ॥ ८४-८५ ॥ परशुरामजी ! इस प्रकार पराचितिके निर्मल स्वातन्त्र्यके कारण अपना ही स्वरूप अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न होकर भासने लगा है ॥८६॥ अभिमानका किसी एक देशमें टिक जाना ही 'परिच्छेद' है। वही अपूर्णत्वबुद्धि भी है, जिसे 'अविद्या' नामसे कहा जाता है ॥८७॥ अपने आत्माका अनुसन्धान न करने तथा बाह्य दृष्टिसे स्थित रहनेके कारण इस विषयमें अनेकों तार्किकों और पण्डितोंको भी भ्रम हो जाता है ॥ ८८ ॥ १. अर्थात् असम्भव बातोंको भी सम्भव कर देनेवाला है।

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