भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

२७२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सौरालोकं यथोलूकस्तमोमात्रं प्रपश्यति ॥ ७६ ॥ आकाशमेव विज्ञास्तु पश्यन्त्यात्मचिदात्मकम् । परा चितिः परेशानी स्वच्छस्वातन्त्र्यवैभवात् ॥ ७७ ॥ अवभासयदात्मानं परिच्छिन्नमनेकधा । यथा राम स्वमात्मानं स्वप्ने बहुविधं पृथक् ॥ ७८ ॥ मनुष्यादिविभेदेन भासयत्येवमेव हि । अनेकधावभासोऽपि परिच्छिन्नदृशैव हि ॥ ७९ ॥ स्वयं स्वदृष्ट्या पूर्णात्मरूपिण्येव परा चितिः । ऐन्द्रजालिक एकोऽपि स्वमात्मानमनेकधा ॥ ८० ॥ भासयंस्तत्र द्रष्टॄणां स्वदृष्ट्या भासयेत् स्वयम् । एक एव निर्विकार एवं सा परमा चितिः ॥ ८१ ॥ शुद्धैकरूपभासापि परिच्छिन्ना ह्यनेकधा । परिच्छिन्नस्वरूपाणां भासयेन्मायया वृता ॥ ८२ ॥ जैसे उल्लू सूर्यके प्रकाशको ही अन्धकाररूपमें देखा करते हैं ॥ ७६ ॥ ज्ञानी पुरुष तो आकाशको ही चेतन आत्माके रूपमें देखते हैं। भगवती पराचिति अपने निर्दोष स्वातन्त्र्यके बलसे अपने स्वरूपको ही अनेक प्रकारसे परिच्छिन्न रूपोंमें प्रकट करती है, जिस प्रकार कि परशुरामजी ! स्वप्नावस्थामें वह मनुष्यादि अनेकों रूपोंमें स्वयं ही भासित हुआ करती है ॥ ७७-७९ पू० ॥ उसका यह अनेकरूपसे भासना भी परिच्छिन्न दृष्टिसे ही है। स्वयं अपनी दृष्टिमें तो वह पराचिति परिपूर्ण आत्मस्वरूपिणी ही है ॥ ७९ उ०-८० पू० ॥ जिस प्रकार ऐन्द्रजालिक (जादूगर) अकेला होनेपर भी अपनेको दर्शकोंके प्रति अनेकों रूपोंमें आभासित करनेपर भी अपनी दृष्टिसे तो स्वयं अकेला ही रहता है ॥ ८० उ०-८१ पू० ॥ इसी प्रकार वह पराचिति एक और निर्विकार ही है तथा [अपनी दृष्टिमें] शुद्ध एकरूपमें ही भासती भी है, तथापि मायासे आवृत होनेपर वह परिच्छिन्न होकर अनेकों परिच्छिन्न रूपोंको भासित करने लगती है ॥ ८१ उ०-८२ ॥