त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः। २७५ व्यावृत्तिः स्पर्शहीनेयं परिच्छेदविवर्जनात् । सर्वमस्यां यतः संस्थमादर्शे नगरं यथा ॥ ९५ ॥ व्यावृत्तिर्वा परिच्छेदः कथं केन हि सम्भवेत् । एवं पूर्णस्वरूपायाः पूर्णं यत्स्फुरणं स्थितम् ॥ ९६ ॥ तदेव स्वात्मविश्रान्तिः पूर्णाहन्ता च कथ्यते । अखण्डैकरसं ह्येतदेतावद्राम वै भवेत् ॥ ९७ ॥ निरूपणे बहुविधमिव तत् प्रतिभासते । एतावदेव स्वातन्त्र्यं यतः शक्तिर्हि तन्मयी ॥ ९८ ॥ प्रकाशस्तेजसो यद्वदौष्ण्यं चैवापृथक् स्थितम् । एवं स्वातन्त्र्यविश्रान्तिसहितैकरसात्मिका ॥ ९९ ॥ इयमेव हि मायाख्या शक्तिः परमदुर्धटा । आदर्शवद्यत्स्वरूपे चिदेकरसरूपिणी ॥ १०० ॥
[ इसमें अन्य सभीका अभाव है ] इसलिये यह व्यावृत्ति सब प्रकारके परिच्छेदसे शून्य होनेके कारण भेदके स्पर्शमें रहित है; क्योंकि दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान सब कुछ इसीमें भास रहा है ॥ ९५ ॥ फिर इसकी व्यावृत्ति या परिच्छेद किसीके द्वारा कैसे हो सकते हैं । इस प्रकार इस पूर्णस्वरूपाका जो पूर्णरूपसे स्फुरित होना है वही स्वात्मविश्रान्ति या पूर्णाहन्ता कही जाती है । परशुराम ! ऐसी यह चिति सचमुच अखण्ड एकरस ही है ॥ ९६-९७ ॥ केवल निरूपण ( चर्चा ) के समय ही वह अनेक रूप-सी भास- ने लगती है । यही उसका स्वातन्त्र्य है और वास्तवमें वो उसका वह परमस्वातन्त्र्यरूप सामर्थ्य भी तद्रूप ही है, [ उससे भिन्न नहीं ] ॥ ९८ ॥ जिस प्रकार अग्निमें प्रकाश और उष्णता उससे अभिन्न ही रहते हैं उसी प्रकार इन स्वातन्त्र्य और विश्रान्तिके सहित वह एक- रसरूपा ही है ॥ ९९ ॥ यही असम्भवको भी सम्भव कर देनेवाली माया नामकी शक्ति है, जो दर्पणकी तरह अपने स्वरूपमें एकरस चित्स्वरूपिणी रहते हुए