त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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सत्यप्यनेकवैचित्र्याभासनेन विभासते । तथा भासनकालेऽपि स्वरूपादनिवर्त्तनम् ॥ १०१ ॥ परिच्छेदावभासो यः सोऽनात्माभास उच्यते । साऽविद्या जडशक्तिः सा शून्यं प्रकृतिरेव च ॥ १०२ ॥ अत्यन्ताभाव आकाशस्तमः प्रथमसर्गकः । सर्वं तदेव संप्रोक्तं परिच्छेदनमादिमम् ॥ १०३ ॥ राम यः परिपूर्णात्मा विश्रमो वै समास्थितः । तस्यैकदेशताभ्रान्तिकृतमाकाशभासनम् ॥ १०४ ॥ अत आत्मप्रदेशो य आत्माभिमतिवर्जितः । आकाशः स हि सम्प्रोक्तः स हि संसारकारणम् ॥ १०५ ॥ एष एव भवेद्भेदः पशुदृष्ट्यैकगोचरः । राम सूक्ष्मदृशा पश्य य आकाशस्त्वयेक्ष्यते ॥ १०६ ॥ तत्रत्यजीवराशीनामात्मा चैतन्यमेव सः । यथान्यदेहेष्वाकाशो भासते यः सदा तव ॥ १०७ ॥
ही अनेकों विचित्र आभासोंके रूपमें भासने लगती है। और इस प्रकार भासनेके समय भी अपने स्वरूपसे च्युत नहीं होती ॥१००-१०१॥ इसमें जो परिच्छेदोंकी प्रतीति होती है वही अनात्माभास कही जाती है। तथा वही अविद्या, जडशक्ति, शून्य और प्रकृति भी कहलाती है ॥ १०२ ॥ उसका वह प्रथम परिच्छेद ही अत्यन्ताभाव, आकाश, तप और प्रथम सर्ग कहा जाता है ॥ १०३ ॥ परशुराम ! इसकी जो पूर्णाहन्तारूप विश्रान्ति है उसीमें एक- देशताकी भ्रान्ति होनेसे आकाशका भान होने लगता है ॥ १०४ ॥ अतः आत्माका जो प्रदेश आत्माभिमान (अहंभाव) से रहित है वही आकाश कहा जाता है और वही संसारका कारण है ॥ १०५ ॥ यह आकाश ही अज्ञानियोंकी दृष्टिसे दिखायी देनेवाला भेद है। [और भेद ही संसारका मूल है, इसीसे इसे संसारका कारण कहा है।] परशुराम ! तुम सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो। तुम जो आकाश देखते हो वही तो उसमें रहनेवाले जीवसमूहका चैतन्य आत्मा है ॥ १०६-१०७ पू० ॥