भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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अष्टादशोऽध्यायः । २६७ तदेव ह्यात्मनो रूपमित्युक्तं तत् कथं भवेत् । आत्मनो हि मनः प्रोक्तं करणं ज्ञानकर्मणि ॥ ४७ ॥ मनो यद्यात्मनो न स्याद्विशिष्येत जडात् कथम् । मनो जडाद्विशेषः स्यादात्मनो भगवन्ननु ॥ ४८ ॥ मनसैव हि बन्धः स्यान्मोक्षो वाऽप्यात्मनः स्फुटम् । सविकल्पं मनो बन्धो मोक्षः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥ ४९ ॥ तत् कथं मन एवात्मा करणं हि मनः स्मृतम् । निर्विकल्पस्य संसिद्धावपि द्वैतं तु शिष्यते ॥ ५० ॥ अथापि लोके दृष्टोऽस्ति यस्य भ्रान्तिरसन् हि सः । न हि भ्रान्तिरसत्या स्यात्तदद्वैतं कथं भवेत् ॥ ५१ ॥ अर्थक्रिया न क्वचिच्च दृष्टा सत्येन वस्तुना । सो ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि ज्ञानरूप क्रियामें मन तो आत्माका करण कहा गया है ॥ ४५ उ०-४७ ॥ यदि आत्माके पास मन न हो तो जडवर्गसे उसका अन्तर कैसे होगा ? भगवन् ! आत्माका जो जडवर्गसे भेद है उसका कारण मन ही तो है ॥ ४८ ॥ तथा यह भी स्पष्ट है कि मनके कारण ही आत्माके बन्धन और मोक्ष होते हैं। सविकल्प मन ही आत्माका बन्धन है और निर्विकल्प ही उसका मोक्ष है ॥ ४९ ॥ ऐसी अवस्था में मन ही आत्मा कैसे हो सकता है ? मन तो उसका करण ही माना गया है। अतः निर्विकल्प मन मोक्षमें कारण हो भी तो भी [ आत्मा और मन-यह ] द्वैत तो रहता ही है ॥ ५० ॥ लोकमें यह भी देखा गया है कि जिस वस्तुकी भ्रान्ति होती है वही असत्य होती है। स्वयं भ्रान्ति तो असत्य नहीं होती¹। ऐसी अवस्थामें द्वैतका अभाव कैसे हो सकता है ॥ ५१ ॥ जो वस्तु असत्य होती है उसके द्वारा कभी व्यवहार होता भी १. तात्पर्य यह कि जैसे रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति होती है तो उसमें सर्प ही असत्य होता है, भ्रान्ति होने की घटना तो असत्य नहीं होती। अतः द्वैतका सर्वथा अभाव तो नहीं हुआ।