त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भासते स्वाच्छन्द्यशक्त्या नाधिकं विद्यते क्वचित् । इति वाक्यं समाकर्ण्य पुनः पप्रच्छ भार्गवः ॥ ४१ ॥ भगवन् भवता प्रोक्तं दुर्घटं प्रतिभाति मे । शुद्धा चितिर्विचित्रैका भासते इत्यसम्भवात् ॥ ४२ ॥ चितिश्चेत्यमिति द्वेधा वस्तु सर्वैर्विभावितम् । तत्र चेत्यं चिता भास्यं स्वप्रभा चितिरस्तु वै ॥ ४३ ॥ यथा लोकभातमपि वस्तु तद्भिन्नमस्ति वै । एवं चिता भासितं तु चेत्यमस्तु पृथग्विधम् ॥ ४४ ॥ चेत्यं चिदात्मकमिति नानुभूतिं समारुहेत् । अथ च प्रागभिहितं जनकेन महात्मना ॥ ४५ ॥ सङ्कल्पवर्जनादेव निर्विकल्पं मनो भवेत् । तदेव निर्विकल्पं स्याज्ज्ञानं संसारनाशनम् ॥ ४६ ॥ अतः चेतनस्वरूप अपना आत्मा ही अपनी स्वातन्त्र्यशक्तिके द्वारा उस-उस वस्तुके रूपमें सदा भास रहा है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है ॥ ४० उ०-४१ पू० ॥ दत्तात्रेयजीका यह उपदेश सुनकर परशुरामजीने फिर पूछा— “भगवन् ! आप जो कुछ बता रहे हैं वह तो मुझे असम्भव-सी बात जान पड़ती है। एक शुद्ध चेतन ही अनेक रूपमें भास रहा है—ऐसा तो हो नहीं सकता ॥ ४१ उ०-४२ ॥ चेतन और चेत्य—ये तो सभीने दो तत्त्व माने हैं। इनमें चेत्य चेतनसे भासित होता है, अतः चेतनका स्वयंप्रकाश होना तो ठीक है ॥ ४३ ॥ लोकमें जिस प्रकार भासित होनेवाली वस्तु भासकसे भिन्न होती है वैसे ही चेतनसे भासित चेत्यका उससे पृथक् होना भी उचित ही है। किन्तु चेत्य चेतनस्वरूप है—यह बात तो अनुभवमें नहीं आती ॥ ४४-४५ पू० ॥ इसके सिवा महात्मा जनकने जो पहले कहा कि संकल्प त्याग देनेसे ही मन निर्विकल्प हो जाता है। यही संसारकी निवृत्ति करनेवाला निर्विकल्प ज्ञान है और यही आत्माका भी स्वरूप है—