त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सर्वं हि जागतं वस्तु स्थिरमर्थक्रियाकरम् ॥ ५२ ॥ तदसत्यं कथं ब्रूहि यतोऽद्वैतं प्रसिद्ध्यति । सर्वं च भ्रान्तिविज्ञानं भ्रान्त्यभ्रान्तिभिदा कथम् ॥ ५३ ॥ भ्रान्तिः सर्वसमा वापि कथं स्याद् ब्रूहि मे गुरो । सन्देह एष विरतो हृदि मे परिवर्त्तते ॥ ५४ ॥ इत्येवं प्रश्नमाकर्ण्य दत्तात्रेयः समस्तवित् । साधुप्रश्नप्रहृष्टात्मा प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५५ ॥ राम साधु त्वया पृष्टं प्रोक्तप्रायमिदं पुनः । यावन्न मनसस्तोषस्तावद् भूयो विशोधयेत् ॥ ५६ ॥ गुरुर्वापि कथं ब्रूयादपृष्टस्तन्मनोगतम् । प्राणिनां हि बुद्धिभेदात्तर्कः पृथगवस्थितः ॥ ५७ ॥ अपृष्ट्वा स्वस्वाऽभिमतं कः सन्देहाद्विमुच्यते । नहीं देखा गया । किन्तु संसारके सब पदार्थ तो स्थिर हैं और उनके द्वारा व्यवहार भी चल रहा है ॥ ५२ ॥ बताइये, वे असत्य कैसे हो सकते हैं, जिससे कि अद्वैतकी सिद्धि हो । यदि सारा ज्ञान भ्रान्तिरूप है तो इसमें भ्रान्ति और अभ्रा- न्तिका भेद भी कैसे होगा ? ॥ ५३ ॥ साथ ही, गुरुदेव ! यह भी बताइये कि यह भ्रान्ति सबको समान रूपसे क्यों भासती है ? मेरे हृदयमें यह बड़ा भारी सन्देह चक्कर काट रहा है” ॥ ५४ ॥ ऐसा प्रश्न सुनकर सर्वज्ञ दत्तात्रेयजीको इस सुन्दर प्रश्नके कारण बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने कहना आरम्भ किया—॥ ५५ ॥ “परशुराम ! तुमने सुन्दर प्रश्न किया । ये बातें प्रायः कही जा चुकी हैं । तथापि जबतक अपने मनको सन्तोष न हो तबतक बार- बार इनपर विचार करना ही चाहिये ॥ ५६ ॥ यदि पूछा न जाय तो गुरु भी शिष्यके मनमें छिपे सन्देहके विषयमें किस प्रकार कह सकते हैं । प्राणियोंकी बुद्धियाँ अनेक प्रकार की हैं, अतः उनके समाधानके लिये युक्तियाँ भी अलग- अलग हैं ॥ ५७ ॥ अतः अपने-अपने आशयके विषयमें प्रश्न किये बिना भला कौन