त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ प्रश्रयावनतो भूत्वा सम्प्रष्टुमुपचक्रमे । इत्याज्ञप्तो जामदग्न्यः प्रणम्याऽत्रिसुतं मुनिम् ॥ १ ॥ भगवन् गुरुनाथार्य सर्वज्ञ करुणानिधे ! पुरा मे नृपवंशेषु क्रोधः कारणतो ह्यभूत् ॥ २ ॥ तद्भूयो निहतं क्षात्रं सगर्भं सस्तनन्धयम् । मया त्रिःसप्तकृत्वो वै क्षत्रासृग्भरिते हृदे ॥ ३ ॥ सन्तर्पिताः पितृगणास्तुष्टा मद्भक्तिगौरवात् । मत्क्रोधं शामयामासुः शान्तः पित्राज्ञयाप्यहम् ॥ ४ ॥ सम्प्रत्ययोध्यामध्यास्ते यः श्रीरामो हरिः स्वयम् । क्रोधान्धस्तेन भूयोऽहं सङ्गतो वलदर्पितः ॥ ५ ॥ द्वितीय अध्याय ॥ २ ॥ परशुरामका प्रश्न, गुरुदेवका आश्वासन इस प्रकार आज्ञा मिलनेपर परशुरामजीने अत्रिनन्दन श्रीदत्तात्रेय मुनिको प्रणाम किया और अत्यन्त विनीत होकर पूछने लगे ॥ १ ॥ भगवन् ! आप मेरे गुरुदेव, स्वामी और पूज्य हैं । करुणानिधे ! आप सभी कुछ जानते हैं । बहुत दिनोंकी बात है; एक विशेष कारणसे मुझे क्षत्रिय वंशोंके प्रति क्रोध हुआ था ॥ २ ॥ अतः मैंने इक्कीस बारमें गर्भ और बच्चोंको भी न छोड़कर सम्पूर्ण क्षत्रियोंका संहार कर डाला था और उनके रक्तसे कुण्ड भर दिये थे ॥ ३ ॥ उस रक्तसे मैंने पितरोंका तर्पण किया । मेरे ऐसे भक्तिभावसे पितृगण प्रसन्न हुए और उन्होंने मेरे क्रोधको शान्त किया । इस प्रकार पितरोंकी आज्ञासे शान्त होनेपर भी [ जब मुझे मालूम हुआ कि ] अभी अयोध्यामें स्वयं भगवान् विष्णु रामरूपसे विराजमान हैं तो मैं बलके घमण्डसे क्रोधान्ध होकर उनसे जा भिड़ा ॥ ४-५ ॥